मैं आजकल बहुत भूलने लगी हूँ,
कोशिश भी नहीं करना चाहती की सब कुछ करीने से याद रख सकूं।
कभी कभी बहुत हल्का महसूस होता है कि - चलो दिल और दिमाग पर जोर नहीं पड़ता।
जो बीत गया उसे क्या याद रखना ?
नाम भूल जाना ,
तारीखें भूल जाना,
कहीं बहुत एतिहात से रखा सामान भूल जाना,
पुरानी कई महत्वपूर्ण घटनाएं भूल जाना ,
कही हुई बातें भूल जाना, पढ़ी हुई कहानियों को भूल जाना वगैरह वगैरह...
भूल जाने के इस लंबे क्रम में थोड़ा बहुत खुद को भी भूलती जाना।
ऐसा लगता है अंदर कितनी जगह बनती जा रही है, कितने मर्तबान खाली होते जा रहे हैं..
वज़न कम और जिस्म हल्का होता जा रहा है।
भूलने के इस क्रम में कितने ही कैद परिंदों को आज़ाद कर दिया है मैने,
खुले आसमान में उड़ने की मेरी अपनी ख्वाहिश जैसे अब पूरी होने को है।
मैं एक दिन जमीन से उठ कर बैठ जाऊंगी किसी हरियाले पेड़ की सबसे ऊंची शाख पर,
और फिर किसी खुशगवार दिन,
भर कर एक गहरी सुकून भरी सांस फैला दूंगी अपने डैने ..
और उड़ जाऊंगी आसमान में।
बहुत सारे इंतजार में एक ये वाला इंतजार भी है शामिल।
मुझे दुनिया में कोई क्रांति लाने की चाह नहीं,
किसी नए बदलाव की चाह नहीं,
मैने कोई उम्मीद नहीं लगाई है किसी चमत्कारी परिवर्तन की,
मुझे किसी बहस में नहीं दिखाना है अपना वाकचातुर्य।
मैं तो इस भूलने के सफर पर चलते हुए बन जाना चाहती हूँ एक चिड़िया
और हो जाना चाहती हूँ फुर्र....
लिली 🐦
