बुधवार, 28 जनवरी 2026

गपाष्टक (लिली के लिलियापे)


 


अजय कुमार जी की समीक्षा 


जितना मैंने इस किताब को समझा

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           अपनी बात शुरू करता हूं मैं गपाष्टक के इस कथन से..कि- 

"जो लोग कहते हैं...वो आप नहीं होते हैं

और जैसे आप होते हैं..वैसे लोगों तक कभी पहुंचना 

नहीं चाहते....

 यह बात लगेगी एक छल्ले सी पर दरअसल है एक सीधी रेखा..."

अब क्या सचमुच रोज छल्लों जैसी बनती उलझती इस जिंदगी को..शब्दों की एक सरल रेखा में व्यक्त किया जा सकता है,क्या खुद को..अपने लिखने से अपनी किताब के माध्यम से ऐसे पेश किया जा सकता है कि यह लगे आपने एक रेशमी रूमाल में ऐहतियात से एक बुझता मगर अंदर से सुलगता एक अंगारा लपेट दिया है.. और मेरी समझ में...ठीक यही करने की कोशिश की है लिली मित्रा जी ने अपनी इस किताब गपाष्टक में..जिंदगी की इस "कटहली वेदना' को कभी तंज..कभी व्यंग्य और कभी हास्य के साथ पेश करके....।

             लिली मित्रा एक लेखक हैं...और पाक कला 

में निपुण महिला भी..तो उन्होंने अपनी इस द्विगुणित प्रतिभा को इस किताब गपाष्टक में अपनी किचन में एक भरवां करेले की तरह अंदर एक चटपटा मसाला भरकर अपनी समझ के धागे से लपेटकर अच्छे से पकाया है..यह धागा कभी अपनी समझ का है..कभी ऊब का है..कोफ्त का है..खिसियाहट का है और कहीं कहीं एक शिकायत का भी है..जिसे सावधानी से.. गपाष्टक और लिलियापे की स्टफिंग के साथ...अपनी हल्की फुल्की शैली से गार्निशिंग करके,एक साफ धुली और चमकती प्लेट..(जो चित्र हैं किताब में )पर परोसा गया है...।

एक बात जो शायद बाद में कहने से रह जाये वो है इस किताब का सुरूचिपूर्ण कलेवर...और उसके लाजवाब बोलते बतियाते चित्र...पहले कभी टाइम्स ऑफ इन्डिया में आर.के. लक्षमण के सरल सहज चुभते व्यंग्यों जो आम आदमी के माध्यम से राजनैतिक व्यवस्था और मध्यमवर्गीय पिसती जिंदगी के ताज़ा हाल जैसे होते थे..कुछ कुछ वही अंदाज और तरीका.. लिली जी ने सौरभ जी के प्रवीण चित्र कौशल के साथ पेश करने की कोशिश की है..मगर इस बार केंद्र में एक मध्यवर्गीय महिला है.. जिसमें कभी घर से और कभी उसके सहन से...कभी किचन से और कभी सड़क पर चलते आस पास की हर चीज़ का अपनी तरह जायजा लेती एक नज़र है और सबसे जो अच्छी बात मुझे लगी वो है किताब के बारे में लिली जी के हमसफर प्रियदर्शी जी का ठोस एन्डोर्समैंट..मतलब एक फुल फैमिली प्रयास।

           किताब की कुछ पंक्तियों को कुछ उदाहरणों की तरह आपके सामने रख कर मैं अपनी बात थोड़ी साफ करता हूं..चावल,दूध,चीनी से मिलकर बनी खीर यदि उबल कर गैस पर फैल जाए..तो रगड़ रगड़ कर साफ करने को तैयार रहिए..

भाटरमेलन में अपनी सारी सावधानी के बावजूद खाते वक्त कोई बीज मुंह में आ जाए तो उसे 'नटी' समझ कर खा जाइये..

किचन में यदि मोबाइल पर चैट करते हुए कोफ्तों का सत्यानाश हो जाए और डाइनिंगटेबुल पर जले हुए कोफ्तों की बात चले तो..और बात भी गर जलने लगे..तो आप समय रहते ही उसे सावधानी से पलट दें..

किसी महिला की जिंदगी में पहला क्रश..अदरक,काली मिर्च कूटना भी होता है..

कभी कॉफी,चाय ,नाश्ता और दूसरे रोजमर्रा के काम यदि बहुत चुभने लगें तो खुद को शोले के 'हाथ कटे' ठाकुर की तरह देखने की एक निर्दोष सी कामना होने लगती है 

या अपनी हैसियत घर की मुर्गी दाल बराबर लगे तो एक मुर्गी की तरह जिन्दगी की कढ़ाई से पक पकाक करते भाग निकलिए...

  एक और सबसे महत्वपूर्ण खंड है इस किताब का... 

जो है लघु पर पूरी किताब पर भारी है...और वो है... शायर'अ' डेंजर प्रजाति..'होश' से बढ़ कर कोई गुनाह नहीं जो मस्त है वो होशियार निकला...खूब ख़बर ली है लिली जी ने इस शायराना अध्यात्म की और इस बहाने खुद अपनी...'रेन डांस' करने के बाद कमरे में भरे पानी को वाइपर से समेटना...

चांद शरमा जायेगा चांदनी रात में यूं जुल्फें न अपनी संवारा करो..यह सुन कर यह कहना मतलब हम "हॉलोविन डायन" की तरह बाल बिखेरे फिरती रहें...याद रखना चाहिए लिली जी खुद एक कवयित्री हैं..उनके ये वाक्य जैसे सब कुछ कह जाते हैं...और सार.. जिन्नगी भाटरमेलन है बाकी सब माया मोह..मतलब कहीं सुख का गूदा है तो कहीं आपका स्वाद बिगाड़ते.. उसके दुख रूप बीज..जिन्हें नटी  समझ कर चबाते रहना ही जिंदगी है...

       सच कहूं यह किताब मुझे उनकी पहली किताब "अतृप्ता" की एक प्रतिध्वनि लगी...जहां वो किताब उनके अन्तस की गहराइयों से निकली.. एक नारी की शाश्वत पीड़ा का चुभता बोध है.. तो यह किताब बाहर चलती जिंदगी का रोजमर्रा का स्यापा है जो सड़क पर मिले गढ्ढे..स्कूटर पर आ पड़ी 'पीक' या व्यर्थ मनते..

नारी दिवस और स्टीरियोटाइप "स्त्री विमर्श "से उपजी है...जिसे वो बेवज़ह लिलियापा कहती हैं..जबकि उस की अपनी एक ख़ास वज़ह है....जाहिर है वो बेवज़ह की वज़ह होती है मगर शायद नहीं भी होती....

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अजय कुमार

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