शनिवार, 30 सितंबर 2017

शक्ति स्वरूपा नारी,, सुरक्षा की मोहताज,

                      (चित्राभार इन्टरनेट)



शक्ति स्वरूपा नारी की सुरक्षा,सम्मान,और गौरव,,, एंव समाज में उनकी प्रतिष्ठा को प्रतिस्थापित करने की गुहार लगानी है,,,,कलम उठा कर समाज के सभ्य जनों जागरूक बनाना है,,।
बेटी बचाओ ,,बेटी पढ़ाओ का नारा दीवारों ,, गाड़ियों बसों,गली -कूचों में चलते फिरते इश्तेहारों की तरह छापना है। कितना दुर्भाग्यपूर्ण लगता है!!!!!
   नारी को अबला बना कर हर कोई उसका तबला बजाता दिखता है,,, बस एक अति संवेदनशील मुद्दा । द्रवित भावनाओं का प्रवाह,, दयनीय अस्तित्व के चीथड़े उड़ाती रचनाएं। आंसू बहाती महिलाओं के  दारूण चित्र,,,,कभी-कभी लगता है हम जागरूक बना रहे हैं या अपनी नुमाइश लगा रहे हैं।
     हर पुरूष नारी मनोभावों से भली-भांति परिचित दिखता है, नारी की गरिमा के सामने  नतमस्तक है,,फिर भी पुरूषों द्वारा महिलाओं के साथ दुरव्यवहार की खबरों में कमी आती नही दिखती,,। महिला,अन्य महिला के मन को समझती है,, फिर भी सांसे बहुओं को प्रताड़ित और बहुएं सासों की निन्दा करती नज़र आती हैं। महिला दिवस के नाम पर आयोजनो और चर्चाओं का माहौल गर्म रहता है,,,अमल कितने करते हैं उन पर यह भी चर्चा का विषय होना चाहिए। हाथी के दांत सा है यह विषय ,,दिखाने के अलग ,खाने के अलग।
     कैसा विरोधाभास है ये,,,,?????? किसको क्या याद दिलाना है,,,, किसको क्या समझाना है,,,? मन भ्रमित हो जाता है।
    माँ बेटी की सबसे बड़ी हितैषी,,,पर जब वही माँ अपनी बेटी को कुलक्षनी कहती है,,,बेटे और बेटी में भेदभाव करती है,, तो बेटियों का परम हितैषी किसे समझा जाए?
     पिता पुत्री का संरक्षक,,,, पर जब घर के किसी कोने में वही पिता 'भक्षक' बन जाए तो ,,, बाहर समाज मे घूमते भेड़ियों को क्या कहा जाए,,? पैसे के लोभ में अपना ही भाई अपनी बहन को वैश्या बना दे,,तो  बहन की रक्षा की प्रतीक  राखी किसकी कलाई पर बांधी जाय,,? यह भी एक कटु  सत्य है,,,यूँ कहिए तस्वीर का एक रूख यह भी है ।लिखते हुए अच्छा नही लगा,,पर लिखा । घर से बाहर सुरक्षा तो बाद में आती है,,घर की चार दीवारी में कितनी लड़कियां सुरक्षित हैं यह भी विचारणिय है।
     सोशल मीडिया पर बाढ़ की तरह बहते 'नारी के सम्मान और अस्तित्व की सुरक्षा' से सम्बन्धित लेख रचनाएं,, विज्ञापन,कहानियां और ना जाने क्या क्या,, देखने को मिलता है,,, हैरानी होती है ,,, फिर भी नारियों के प्रति समाज का नज़रिया बद से बदत्तर ही होता जा रहा है। दोषी केवल पुरूष वर्ग ही नही ,, महिलाएं भी इसके लिए पूरी तरह जिम्मेवार हैं।
     देश भर मे देवी के नौ रूपों की पूजा पूरी श्रृद्धा और निष्ठा से समपन्न हुई,,,पर देवी का जीता जागता प्रतिरूप नारी कितनी पूजनीय है यह एक ज्वलंत प्रश्न है,,,केवल पुरूष वर्ग के लिए ही नही महिलाओं के लिए भी।

लिली

दुर्गापूजा,,,, एक आनंदोत्सव



       ( मनमोहक सिन्दूरदान चित्र हेतु बहन मिनी को आभार )

दशमी के दिन माँ कि प्रतिमा देखती हूँ तो आंखे भर आती हैं,,,दुर्गा जी के नयन भी छलछलाते से प्रतीत होते हैं। कैसे पांच दिन पहले उनके आगमन के उल्लास से पूरा वातावरण जैसे नाच रहा था,,,और आज जाने का दिन आ गया। यह भाव देवी प्रतिमा के मुखमंडल पर भी झलकता सा प्रतीत होता है।
   पता ही नही चलता पूजा के ये दिन कैसे बीत जाते हैं।
'महालया' की प्रभात माँ की अलौकिक आगमनी प्रकाश से प्रकाशमान हो जाती है। कानों में ढाक और घंटे का नाद,,और नसिका में लोहबान की महक सुवासित हो जाती है। दिनों की गिनती शुरू हो जाती है।
     पूजा पूजा सारा वातावरण,,,मन का नर्तन आंनद से । अश्विन मास का नीला आकाश,,कास के लहलहाते फूल,,और बयार में हरश्रृंगार की महक,,शरद ऋतु की दस्तक का बिगुल बजाती हुई। मौसम संग उत्सवी उमंग,,,,हर मन उल्लासित।
       नव वस्त्र, नव साज, पूजा, पुष्पांजली,भोग,प्रसाद, खेल-विनोद, नाच-गान, नाटिकाएं, रवीन्द्र संगीत,, घूमना-टहलना ,,,टोलियों में बैठ ठहाके लगाना,,खान-पान,,और बेफ्रिक्री दुर्गा पूजा का दूसरा नाम,,।
      संध्या की आरतियां धुनिची नाच, ढाक की ताल पर ताल मिलाना,,और भाव भंगिमाओं की जुगलबंदियां ,,आहाआआआ उस पल तो लगता है जीवन कितना संगीतमय,,,!!! लोहबान की खुशबूँ दिनो बाद भी कपड़ों से जाती नही,,,।
       पंडाल के किसी कोने में चुपचाप बैठ माँ दुर्गा की प्रतिमा को निहारने का भी एक अपना ही आनंद होता है। ऐसा लगता है जैसे हमारे साथ माँ दुर्गा भी अपनी सारी चिन्ताएं और दायित्वों का भार कुछ दिनों के लिए भूल हमारे साथ उत्सवमयी हो रही हैं।
      पंचमी के बोधन(प्रतिमा के मुख से आवरण हटाना) और प्राण प्रतिष्ठा ,आनंद मेला, महाषष्ठी के दिन अपने संतान के मंगल हेतु माताओं का उपवास, महासप्तमी की पूजा, महाअष्टमी की पुष्पांजली, अष्टमी नवमी की मिलन बेला की 'संधि पूजा' 108 दीपदान, 108 कमलपुष्पों की माला बना माँ को पहनाना, नवमी की कुमारी पूजा(बेलूर मठ) और हवन,,,और अंत में दशमी के दिन पूजा के बाद दर्पण विसर्जन के बाद माँ की प्रतिमा को 'सिन्दूर दान' और 'देवी बरण' के लिए रखा जाता है।
     सभी विवाहिताएं ,पान मिष्ठान्न खिला माँ को सिन्दूर लगा कर अपने सुहाग और सौभाग्य की कामना का आशीष मांगती हैं।
उसके बाद होता है 'सिन्दूर-खेला'  सिन्दूर एक दूसरे को लगा कर मुँह मीठा किया जाता है।
    ऐसा माना जाता है कि माँ दुर्गा इस समय अपने मायके आती हैं,,और दशमी के दिन माँ का इसप्रकार वरण कर ससुराल भेजा जाता है इस कामना के साथ कि अगले साल माँ इसी उल्लास और सौभाग्य लिए फिर आएगीं ।
     फिर क्या नाचते गाते,,'दुर्गा माई की जय' ' आशते बोछोर आबार होबे' के जयकारे लगाते हुए माँ की प्रतिमा को नदी घाट पर लेजाकर जल में विसर्जित कर दिया जाता है। एक घट में विर्सजित स्थान का जल एक घट में भर लिया जाता है, जिसे 'शांति जल' कहते हैं। समूचा दल जब विसर्जनोपरान्त वापस पंडाल में आता है,,तब यह 'शांति जल' पुरोहित सभी के सिर पर छिड़क सुख और शांति की कामना मंत्रोच्चारण सह देवी से करते हैं।
       इसके उपरांत सभी गुरूजनों के पैर छूकर छोटे उनसे आशीष प्राप्त करते हैं। एक अन्य को विजयादशमी की शुभ कामनाएं देते हैं। खान-पान मेल-मिलाप का यह अवसर  'बिजोया मिलन' कहलाता है। इसी के साथ सब एक नए जोश लिए,,उत्सव की मीठी-मीठी यादों को मन-मस्तिष्क में भर अपनी दैनिक दिनचर्या में लौट जाते हैं इस कामना के साथ,,,,,, #आशतेबोछोर आबार होबे',,,

🌺शुभो बिजॅया🌺

मंगलवार, 26 सितंबर 2017

बेवजह की भी एक वजह,,

                       (चित्राभार इन्टरनेट )

हसरतों की लहरें थमीं थमीं सी हैं,,,। एक चट्टान सी है खड़ी साहिल पर,,,,,बड़ी दूर से अपनी ही धुन में मदमस्त लहरें उन्मादीं हो आती हैं,,,,चट्टान से टकरा कर सारा उन्माद छटक पड़ता है,,,,। उन्मादी वेग का चट्टान से टकराव होता है तो एक समूची सी दिखने वाली लहर असंख्य छोटी-छोटी जल बिन्दुओं में बट कर बड़ी दूर तक,,, बड़ी ऊँचाईं तक फैल जाती है,,,,,,,नीचे गिरती है,,,और वापस लौट जाती है,,,।
         कल्पनाओं के पंछीं आवारा मन के असीम आकाश में उड़ते उड़ते जैसे थक कर बिजली के तारों ,,और पेड़ों की शाखों पर बैठ कर सुस्ताने लगे हैं। दम फूल रहा है उनका भी,,,बस उड़ान है आकाश में डैने दुखने लगे अब ,,,,, थकान को आराम एक आधार पर ही मिलता है,,,,,यही सोच रहे हैं,,,पेड़ों की शाखों और बिजली के तारों पर बैठकर,,,,,,,,,,!
         जीवन से मृत्यु के इस लम्बे सफर में कई और छोटे- बड़े 'सफर' अंतरनिहित होते हैं,,,,,। जैसे कि,,,,, घर के किसी कमरे से,,रसोई तक जाना,,,, घर से बाज़ार तक जाना फिर वापस घर को आना,,,एक शहर से दूसरे शहर जाना,,,,ऐसे ही बहुत से 'सफर',,,,,रोज़ाना,,हर पल,, हम तय करते हैं,,,।
      सफर का एक लक्ष्य होता है,,,एक वजह होती है,,एक परिणाम भी होता है,,,जो सफर की सफलता के 'निर्धारक' होते हैं,,,,!
        कुछ सफर ऐसे भी होते हैं,,,,जिनका कोई लक्ष्य नही होता,,,,कोई निर्धारित वजह नही होती,,बस रेल की पटरियों से,,,एक के समानान्तर दूसरी चलती रहती है।
       पर बेवजह शायद कुछ भी नही होता,,रेल की पटरियां ही 'रेल' को चलने का आधार प्रदान करती हैं।
      पटरियां गड़बड़ाईं और रेल दुर्घटना स्थान ले जाती है।
   ये तर्क भी बड़ी कमाल की चीज़ है,,,,भावनाओं की उन्मादी लहरों को किनारों पर खड़ी ठोस चट्टान से अटका देती हैं।
जब कल्पनाओं के पंक्षीं हांफ जाएं मन मनमौजी आसमान की सैर करते करते,,,,तब उन्हे तर्क के तारों पर बिठा देना चाहिए,,,,,। सामन्जस्य बना रहता है,,,,।
         एक मुख्य सफर में अंतरनिहित कई छोटे-छोटे 'महत्वपूर्ण सफरों' के साथ-साथ,,, समानान्तरी बेवजह लगने वाले सफर को भी चलते रहने देना चाहिए,,,,, लेकिन ये सफर जब हावी होने लगें,,,,तब तर्कों की रेलगाड़ी चला देनी चाहिए,,,,,। पुनः वही,,,,,,,,,,,, सामन्जस्य बना रहता है!
     

शुक्रवार, 15 सितंबर 2017

तुम्हारा इन्तेज़ार लिखना है,,,,,

                     (चित्राभार इन्टरनेट)

🌞तुम्हारा इन्तेज़ार लिखना है🌞
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एक इन्तेज़ार हो तुम,,,और मैं अपने इन्तेज़ार को लिखकर गुज़ार रही हूँ। बेचैन सुनी दोपहर ,,जो कभी कभी बहुत ख़ामोश होती हैं। कोई आव़ाज नही सुनाई देती ,,सिवाय छत के पंखे के चलने,,,या कुछ अंतराल पर नीचे सड़क पर गुज़रते किसी स्कूटर या कार की आवाज़ के।
      चिलचिलाती सी धूप से झुलसते पेड़,,, जिन्हे शाम की शीतलता का इन्तेज़ार होता है। उन झुलसे पेड़ों को शाम की शीतलता नसीब होती है,,,,,पर मेरी इन्तेज़ारी दोपहर को शाम की शीतलता नही नसीब,,,,,,,,,,,,।
     कभी-कभी समय बेहिसाब होता है,,काटे नही कटता,,,,दिल बहलाने के समान भी बहुत ,,,पर दिल है कि बहलने को राज़ी नही होता,,,,,,!
      फिर मुझे लिखना पड़ता तुझे,,,,क्या करूँ तू नही तो तेरा जिक्र ही सही,,,,कुछ तो है,,जो तुझे मेरे करीब होने का अहसास कराता है।
     कभी कभी लगता है,,,तुझे पा लेने के ख्याल से बेहतर है,,,तुझे सोचना,,तुझे लिखना,,,!! इसमें तुझे खोने का डर नही होता,,तेरे आने,,,और आकर फिर चले जाने का ख़ौफ नही होता,,,,।
       ये जो तुम एक मेघ के टुकड़े से आकर बेचैन चिलचिलाते सूरज को ढक ,,,,अपने आने का एहसास दिलाते हो,,, इससे मेरा मन नही भरता। बल्कि और तड़प उठता है।
     तुम्हे जाने की जल्दी होती है,,,,और मुझे  तुम्हे रोकर रखने की पुरजोर चाहत,,,, । बहुत सोचकर एक राह निकाली है,,, अब आने के लिए नही कहना है,,,,'लेकिन तुम आओगे' इस आस को जिलाए रखना है,,,,,,।
चलो अब आने कि ज़रूरत नही तुम्हे,,,,, तुम बस 'एक वादा' रख दो मेरे आगे,,,,,,मुझे अब इन्तेज़ार रास आने लगा है।

लिली 😊

बुधवार, 13 सितंबर 2017

हिन्दी दिवस विशेष

                         (चित्राभार इन्टरनेट)

समस्त भारतवासियों को हिन्दी दिवस की शुभकामनाएं!

मै एक गृहिणी हूँ, और हिन्दी को राष्ट्रभाषा रूप में प्रचारित एंव प्रसारित होने और ना हो पाने के कारणों पर मेरा दृष्टिकोंण, भाषा अधिकारियों  से वैभिन्यता रखता हो,उनकी दृष्टि में उतना तर्कसम्मत और वैज्ञानिक ना हो। इसके बावजूद मेरा दृष्टिकोण एक आम भारतीय समुदाय का प्रतिनिधित्व अवश्य करता है  ऐसा मेरा मनना है।
     भारत सतरंगी संस्कृति का समागम है, कितनी भाषाएं,उपभाषाएं,आंचलिक भाषाएं यहाँ बोली जाती हैं,, इसका आंकड़ा तो मुझे ज्ञात नही,इतना जानती हूँ की 15 प्रमुख भाषाओं को संविधान द्वारा मान्यता प्राप्त है। लोग अंग्रेजी को हिन्दी का कट्टर दुश्मन मान कर चल रहे हैं, पर अपने ही घर में हिन्दी अपने अस्तित्व के बचाव मे जूझ रही है,,यह भी अनदेखा नही किया जा सकता।
    कभी आठवीं अनुसूची में भोजपुरी शामिल के लिए अन्शन,कभी राजस्थानी की मांग। 'बोलिओं' के आधार पर नए राज्यों के गठन की मांग,कहीं 'तेलंगाना'...तो कहीं 'झारखंड'।
      ऐसे अनेक उदाहरण हैं, गौरतलब है कि जूझा किस समस्या से जाए? घर के भेदी से? या विदेशी आक्रमणकारी से।
     'अनेकता में एकता' की बात बड़े गर्व से 'कलम' से लिख देते हैं हम, पर क्या यह जुमला हमारे दिलों में अंकित है?
        एक वटवृक्ष सी है 'हिन्दी' कई आंचलिक,क्षेत्रीय भाषाओं की शाखाएं इसे घनीभूत करती हैं,,सशक्ता प्रदान करती हैं। और हम भाषायी राजनीति की कुल्हाड़ी बड़ी निर्ममता से चला रहे हैं।
    अब करती हूँ बात अंग्रेजी भाषा की,तो जनाब भाषा कोई भी बुरी नही होती जिसमें अभिव्यक्ति मुखरित हो वही भाषा मधुर बन जाए। परन्तु सामाजिक प्रतिष्ठा की पहचान बना कर किसी भाषा को जबरन बोलने और सीखने पर मजबूर कर देना,,अभिव्यक्ति की मधुरता और स्वाभाविकता का गला घोंटता सा दिखता है(कृपया मेरे इन विचारों को एक आम नागरिक के दृष्टिकोण से लें,)
      घरों में बच्चे के जन्म लेते ही माँ,'जोकि सार्वजनिक स्थलों पर अंग्रेजी बोलना सामाजिक प्रतिष्ठा का प्रतीक है' ,,कि दुर्भावना से ग्रसित है... बच्चे के द्वारा प्रथम उच्चारित शब्द 'माँ' नही 'मम्मी' सुनना पसंद करती है। 'पिता' के लिए 'बाबा' 'बापू' 'बाबूजी' ना सिखा कर 'पापा' 'डैड" बोलना सिखाती है।
   स्कूलों में अंग्रेज़ी 'आसान वाक्यों' वाले पर्चे वितरीत किए जाते हैं,,,अविभावक-शिक्षक मिलन दिवसों पर ,,शिक्षकों द्वारा,,यह 'गुर' दिए जाते हैं कि रोज़मर्रा में प्रयोग आने वाली चीज़ों के नामों के लिए अंग्रेज़ी शब्द व्यवहार में लाए जाएं।
       मतलब आप अगर ठंडे दिमाग से सोचें तो पाएंगें कि- किस तरह से किसी भाषा को नसों में खून की तरह बहाया जा सकता है, वह मनोवैज्ञानिक खुराक़ हम ले रहे हैं।
    ऐसी "मनोवैज्ञानिक खुराकें" यदि 'हिन्दी' के लिए दी जाती तो आज "हिन्दी" इतनी खस्ताहाल अपने खिरते स्तर को बचाने की गुहार ना लगाती पाई जाती।
      तो बंधुओं और विस्तार की आवश्यकता नही शायद,,इसी से अनुमान लगा लिया जा सकता है कि- "माॅम-डैड" के प्रथम शब्द उच्चारण सीखने वाली संस्कृति के लोग जब नौकरशाह बन बैठते हैं,तब हम जैसे लोग 'हिन्दी दिवस' के आयोजनों पर हिन्दी के गिरते स्तर पर "चर्चा और उपाय" पर अपने विचार लिखते नज़र आते हैं।
  लेखनी को विराम देती हूँ,,वैसे ये रूकना चाह नही रही।


रविवार, 10 सितंबर 2017

मै गीत हूँ उसके लिए,,,

                        (चित्राभार इन्टरनेट)

मै गीत हूँ
उसके लिए
मेरे हर
अंदाज़ को
जबतक वो
गुनगुनाता नही
उसे चैन आता नही

मै ठहर हूँ
उसके लिए
सरसरी नज़र
से मुझे देखकर
उसको सुकून
आता नही,,,,,

किसने कहा
कि मेरा प्यार
सहज है उसके लिए,,?
मुझे पढ़ना होता है,,
मुझको जीना होता है,,
मुझे घोल कर पीना होता है,,
तब कहीं जाकर
नसों में मै प्रवाहित
होती हूँ, लहू की तरह,,,

वो कहता है मुझसे-
 "बोलती हो न,
 मन की बोला करूँ,,
प्यार हो ईश्वरीय अनुभूति
के मानिंद
पर हमेशा नही बोलता"
गहनतम अनुभूति हूँ
मै उसके लिए
नाद स्वर कभी कभी
ही प्रस्फुटित होता है,,,,,,,

शनिवार, 9 सितंबर 2017

स्वच्छ निर्मल रखनी है गंगा,,,,

                        (चित्राभार इन्टरनेट)


मन चंगा तो ,
कठौती में गंगा।
पाप धो धोकर
हो गई मैली गंगा।

वैदिक संस्कृति ,
की,कल कल गंगा।
सिकुड़ रही अब,
विस्तृत गंगा ।

पतित पावनी,
हर हर गंगा।
निज अस्तित्व ,
को गुहारे गंगा।

शब्दों मे ही पावे
भक्ति माँ गंगा
कर्मों से करते
हम,मैली गंगा।

माँ भारती का
आंचल है गंगा
स्वच्छ निर्मल
रखनी है गंगा।।

शुक्रवार, 8 सितंबर 2017

तीनों बन्दर 'फ़ीलिंग फ़्री'

                        (चित्राभार इन्टरनेट)


बापू जी के बंदर तीन
दिखे एकदिन बड़े गम़गीन
मैने पूछा-"बंदर भाई!
चेहरे पर क्यों गम़गीनी छाई?"

बोले बन्दर नम्बर वन,
बड़ा दुखी है मेरा मन।
बंद आँखें पर सुनूँ बुराई,
मोहे भाए ना ये खटाई।

बोले बन्दर नम्बर टू
आँखें कैसे बंद कर लूँ?
हाथ कान पे रखे हूँ,
बुरा आँख से देखे हूँ?

बोले बन्दर नम्बर तीन,
कैसे बजाऊँ अपनी बीन?
बंद मुँह कर रहा ना जाय,
देखूँ सुनूँ तो गुस्सा आयें।

बात तो बोले तीनों ठीक ,
पर ठहरे एक सीख प्रतीक !
मिल जाए इक अचूक निदान,
समस्या विकट तारो भगवान!

तकनीकि का भला हो भाई,
बना दिया जो ये   मो-बा-इल।
सब कुछ भूलकर इसमे गुम,
लेकर घूमें अब हाथ में दुम ।

तभी दिखे एक मस्त कलन्दर,
लीन मग्न मोबाइल के अन्दर।
सीख प्रतीक के उत्तम 'सिम्बल',
आए चौथे 'टेक्नोसेवी बन्दर'।

इन्हें बुरा ना दिखता कुछ
सुनते मन की स्क्रीन पे झुक
आसपास सब भूल के घुप
बोलें मुश्किल से दो टुक।

हो गए मुक्त    बन्दर तीन ,
जश्न मनाएँ तक-धिन-धिन!!
सेल्फी खींची वायरल की,
तीनों बन्दर फ़ीलिंग फ्री ।

गुरुवार, 7 सितंबर 2017

गप्पू गणपति

                       (चित्राभार इंटरनेट)

   
बालकविता
**************

गप्पू गप्पू गंग गणपति।
भोले भाले गंग गणपति।।

भोग लगें जब मोदक के।
जम के खाएँ मन भर के।।


प्रेम भाव विघलित करता।
प्रभु हृदय विचलित करता।।


भक्तों की भक्ति पर कुर्बान।
दिए प्रसन्न हो अक्षुण्ण वरदान।।

आया जब जाने का दिन।
छिप गए सबको बोले बिन।।

मन मोदक पर अटक गया।
साल प्रतीक्षा,मुँह लटक गया।।

प्रिय मोदक और मूषक संग।
चले गणपति गंग गंग गंग।।

बोलो सब मिल एकसुर ताल।
जल्दी आना फिर अगले साल।।

एक नशीली शाम,,

                              (चित्राभार इन्टरनेट)

शाम संवर के सीढ़ियों ,
से,ख्वाब सी उतर रही,
दीदारे यार आखिरी ,
पायदान पर टकरा गया।

वो एक झलक ठगी हुई,
धड़कनों को भड़का दिया,
सांसे थमीं ,पलके झुकीं,
वो लम्हा वहीं पथरा गया।


शाम जाम सी बोतल में बंद,
खुद को बहुत सम्भाले हुए,
ज्यों ज्यों ढली पैमाने में वो,
महफिल का रंग जमता गया।

इश्क था कुछ बंधा बंधा,
रहा कनखियों से झांकता,
शाम तो बस बहक उठी,
नशे का जश्न चढ़ता गया।

नही भुलती वो करीबियां,
जो दूर होकर भी पास थीं,
वो गुज़र रहा था करीब से,
और जिस्म को पिघला गया।

वो शाम-ए- इश्क वस्ल की,
फिर आज पैमानों में ढल गई,
नशा आज भी उसी जोश में,
मेरी रूह तलक़ बहका गया।

बुधवार, 6 सितंबर 2017

चलो मौन हो जाते हैं,,,,,

                         (चित्राभार इन्टरनेट)

चलो मौन हो जाते हैं,,,,,सुना था मैने शायद तुमसे ही,,जब प्रेम विस्तृत होता है तो मौन हो जाता है,,,। फैलाव में,, बंधन-प्रवाह, शिकायत-नाराज़गी, दुख-सुख, दूर-पास, हास्य-रूदन,,,इन सब का कोई अस्तित्व नही होता। प्रेम का आकाश नीला दिखता है,,,,बस नीला,,,फैला हुआ,,दूरररररररररररररर तक,,आंखों की 'देखन क्षमता' सीमित हो जाती है तब शायद,,,। तो चलो मौन हो जाते हैं,,,,,,,,,,,,
     कहते हो,,तम्हारे कर्मक्षेत्र में तुम प्रतिबाधित हो,,भावक्षेत्र में तुम अघाध,अशेष हो। पर इन दो अलग-अलग भूमिकाओं के पीछे,,,,,व्यक्तित्व एक ही है,,,,,,। मेरा तो भावक्षेत्र कर्मक्षेत्र सब एक,,लो,,, मै फिर से शिकायत कर बैठी,,,,।
      मै साफ कर आई सब जाले स्मृतियों के,, । तुमने कहा-" तुम कैसे क्रूरता से सब हटा आई,,???" उँगलिया नही कांपी,,,?"
,बहुत कुछ बहा ले गई मैं बाढ़ आई नदी की तरह,,। उफान कम हुआ तो पाया अपने ही किनारों को काट आई,,जो गांव पलते थे मेरी शांत धारा के सहारे ,,उनको ही बहा आई मैं।
       कैसे कर गई सब ,,? क्यों कर गई सब,,,,? मेरी प्रीत क्या 'विवेक सम्मत' है,,,? क्यों अक्सर उत्पाती बवंडर सी खुद में तुमको भी समेट कर,,,साथ में कई अनमोल यादों की इमारतों के,,छज्जे,छत,खिड़की,,दरवाज़े, सब उखाड़ कर,,तुम्हे खंडहरों में अकेला छोड़,,शांत हो जाती हूँ,,,,,?
       मै मेरी ही न रही,,,और तुम्हारी भी ना हुई,,,तो फिर मैं कहाँ गुम गई,,,,????? मै लेखों से टिप्पणियों में सिमट गई,,,,, अंतरद्वंद को छोड़,,, सामाजिक चर्चाओं में उलझ गई,,,,? ये 'क्षणिक मनोभाव' का आवेग,,,क्यों मुझे खंडित कर धूल सा उड़ा दे रहा,,,,,?
       ठीक कहते हो,,,"चलो मौन हो जाते हैं।"
मेरी विश्लेषणात्मक चाहत तुम्हे कई बार घायल कर गई,,उपेक्षित कर गई, अपमानित कर गई,,,,,,। समझ नही आता ये 'विश्लेषण करने वाला अधिवक्ता' क्यों जागृत हो जाता है मुझमें,,,,,??? कहीं ना कहीं आहत मेरा मन भी हुआ होगा,,,,। रूहानी सा इश्क है,,,सनम इसमें दुनियावी गणित ना लगाओ,,,!!! कैसे ना लगाऊँ,,,,,,,,, ?? कैसे बताऊँ के रूह से जुड़ जाने के बाद मुझमें दुनियावी जुड़ाव की चाहत पनपने लगी हैं,,,।
         तुम्हारे 'वृष्टिछाया क्षेत्रों' सी घनघोर बारिश ने मुझ नदी का जलस्तर सामान्य से ऊपर उठा दिया है,,,,,। नदी अब यह सोचने लगी है कि,,,जलस्तर ऊँचा कर मेघ को ही खुद में समाहित कर ले,,,!!! तभी तो देखो ना आए दिन जुगत लगाने लगी है,,,बाढ़ सी प्रचड़ हो  बहाने लगी है,,,,,,। परन्तु यह कहाँ सम्भव,,,,,,,,!!!!
        ठीक ही कहते हो,,,"चलो मौन हो जाते हैं,,,,!" शायद विश्लेषणात्मक प्रेम को मौन की दरकार है,,,,। तुम्हे भावनात्मक पटखनी देने में मुझे जीत का एहसास कभी नही हुआ,,,। पर तुम्हे लगता है की मै जीत-हार का खेल खेल रही हूँ तो ठीक है,,अब मन नही जीतने का,,,,,।कितनी बार जीत का जश्न मनाऊँ,,,?? अब चलो मै अब हार जाऊँ,,,,,।
       अंत में बस इतना ही,,,,टिप्पणियों में सिमटना मेरा ध्येय नही,,,तुम्हे लेखों में विस्तार देना मेरा लक्ष्य,,, पर,,,तुम अब व्यस्त हो,,,अपने विस्तार को देखने का समय नही,,,,कितने ही विस्तार पड़ें हैं तुम्हारी प्रतिक्रिया के बिना,,,,,!!! क्या मेरा मन आघात नही खाता,,,,????
     शिकायत अब और नही,,,,अब बस मौन। किनारे पर बैठ कर कंकड़ फेकोगें,,अब तभी तंरगित लहरे उठेगीं। ज़ोरों कि मुस्कुराहट आ गई,,,,यह सोच कि,,,
नदी चंचलता छोड़ दे,,,,
फिर किसी तूफान का आगाज़ हो
और बांधों को ना तोड़ दे,,
ऐसा कभी हुआ है भला,,?
अपने किनारों को खुद ही
काट दे,और शांत होकर
उन्ही किनारों में सिमटना
छोड़ दे,,,,,,,,??????
ना,,ना,,ना,,कभी नही
हो सकता,,,,,,!!!
 पर अभी मौन का पालन होगा😜।

मंगलवार, 5 सितंबर 2017

प्रिये लजाई हैं,,,

                            (चित्राभार इन्टरनेट)

लाज से अभिव्यक्तियां सकुचाई हैं।
प्रीत की ओढ़नी,अधरों तले दबाई है।।

नयनों की शरारत,जुगनू सी झिलमिलाई है ।
ढांप पलक झट से,चहक चमक छुपाई है।।

सुवासित खुले केश घनघटा घुमड़ाई है।
बांधें जो खीज के,वेणी नागिन सी लहराई है।।

अस्त-व्यस्त हुए वसन सुध-बुध गवाई है।
चुनर ढांक रही यौवन,झांक रही तरूणाई है।।

पग चले हो मगन,डगर ही डगमगाई है।।
रीझ रही प्रियतम पर,आज प्रिये मदमाई हैं।।

सोमवार, 4 सितंबर 2017

टीचर मेरी सुपर-स्टार,,🌟⭐🌟⭐🌟

                         (चित्राभार इन्टरनेट)

      चुन्ने-मुन्ने बच्चों की तरफ से उनकी प्यारी अध्यापिका के लिए,,,, शिक्षक दिवस पर तोतली बोली में ढेर सारा प्यार उनके अंदाज़ में,,,मेरी कलम से 🐰🌺


                        टीचर  मेरी   अच्छी हैं,
                       बात सिखाती सच्ची हैं।
                       ए,बी,सी,डी हमें पढ़ातीं,
                       खेल-खेल में हमें सिखातीं।
                       मुझको देतीं हैं 'स्टार',
                       टीचर मेरी 'सुपर-स्टार।

एक दबी सी आस,,,,,,झूठ ही सही

                       (चित्राभार इन्टरनेट)

एक आस है,झूठ ही सही,
दिले खास है,झूठ ही सही।
सफर का हमसफर बना लो,
दबी प्यास है,झूठ ही सही।

तुम मेरे साथ हो,झूठ ही सही,
हाथ में हाथ हो,झूठ ही सही।
कोई शाम मेरे साथ गुज़र लो,
बहकते जज़्बात हो,झूठ ही सही।

भोर बाहों में कसी,झूठ ही सही,
खिले लबों पे हंसी,झूठ ही सही।
सिलवटों को फिर से बिगाड़ लो,
सांसे,सांसों में,फंसी,झूठ ही सही।

घर हो एक हमारा,झूठ ही सही,
प्यार से भरा चौबारा,झूठ ही सही।
मै चौखट पर बाट निहारूँ सांझ को,
सिंदूर से मांग हो भरी,झूठ ही सही।

एक आस है,झूठ ही सही,
दिले खास है,झूठ ही सही,,,,,,,,,,