रविवार, 23 अगस्त 2026

चिड़ी ताल


 

मैने बहुत ही सामान्य सी एक इच्छा पाली

जो लगती थी कि बहुत ही छोटी सी बात होगी

पर ऐसा नहीं था - हाँ सच में...!

मैने अपने आंगन की दीवार पर  मिट्टी के दो पात्र रखे

उसमें भरकर रखा पानी ,

और मैं हर रोज़ करने लगी प्रतीक्षा

 नन्ही चिड़ियों की

कोई तो आए तपती झुलसती गर्मी में 

पानी से भरे कटोरे में छपक छपक... चीं चीं... करते हुए खुद को भिगोए, 

नहाए और छितरा दे खूब सारा पानी चारों ओर 

और भरकर तरोताज़ा उड़ान हो जाए फुर्र...

रही रोज़ ताकती -झाँकती मैं..

कभी रसोई की खिड़की से कभी दरवाजे की ओट से।

एक लंबी प्रतीक्षा के बाद -

अब मेरे बनाए छोटे से चिड़ी -ताल में

डुबकी मारती चिड़ियों के चहचहाते झुंड 

मुझे देकर जाते हैं एक उन्मुक्त उच्छ्वास..

एक इत्मीनान भरी मुस्कान ।


मेरे मन की चिड़िया भी 

नहाकर इस सौंधे पानी में

फुर्र हो जाती है इन नन्ही चिड़ियों

के साथ एक उन्मुक्त सफ़र पर


लिली🕊️

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

फैशन या दिखावा नहीं हमारी प्राथमिक आवश्यकता है

 




एक अच्छी आदत शुरू न कर पाने के कितने बहाने हम दे पाते हैं, हैरत होती है ! जितने बहाने हम सोचते हैं उतनी देर में शायद वो अच्छी आदत शुरू की जा सकती है... नहीं? मैने ये विचार कई बार किया है। फिर वो चाहे अपने स्वास्थ्य के प्रति अपना कर्तव्य हो या धरती माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने का धर्म हो। और आप यदि बारीकी से सोचें तो पाएंगे कि - अधिकांश लोग इन दोनों ही मामलों में बहुत ढिलाई बरतते हैं।

ऐसा ही एक विषय है जो पृथ्वी की पारिस्थितिकी को बहुत तेजी से विषाक्त बना रहा है - प्लास्टिक कचरा।

      मुझमे ये जागरूकता आई तो चार - पाँच साल पहले पर इसे कार्यरूप में परिणीति मैं इस वर्ष दे पाई। वही बात कि - अच्छी आदतें शुरू न करने के सौ बहाने होते हैं हमारे पास। खैर मेरे इस संकल्प की परिणिति थोड़ी परिश्रमजन्य रही परन्तु परिणाम आत्मिक संतोष से परिपूर्ण है।

    करीब दो साल से मैने रसोई के गीले कचरे जैसे सब्ज़ी के छिलकों, चाय-कॉफी, अंडे के छिलकों आदि से जैविक खाद बनाना शुरू किया अब मुझे अपनी छोटी सी ही सही पर हरी -भरी  बगिया के लिये खाद मिल जाती है।

  इसी तरह अब  प्लास्टिक की पन्नियों, दूध - दही, तेल  की थैलियों, दंत -मंजन , कॉस्मेटिक वाले प्लास्टिक से बने हर तरह के कचरे को धोकर सहेज कर रखने की आदत हो गई है। फिर मैने सोशल मीडिया पर इनके उचित निस्तारण के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का पता लगाया, और अब... मुझे बहुत अच्छा अनुभव हो रहा है...ये सोचकर कि मैं पृथ्वी की पारिस्थितिकी को और बुरी हालत में न जाने देने के लिए अपना अंशदान करने लगी हूँ, देर से ही सही ।

अपनी सोसाइटी में भी मैं इस आवश्यक जागरूकता को लाने का प्रयास करना शुरू किया है पर फिर वही बात... अच्छी आदतें न शुरू कर पाने के सौ बहाने। पर लोगों को ये समझना होगा कि इस विषय पर भाषणबाजी, लेखनबाजी करने का हक़ अब उसी का हो जिसकी दिनचर्या का हिस्सा धरती माँ के खस्ता स्वास्थ्य की तीमारदारी करना हो।

   इस लेख में स्व का उदाहरण सिर्फ इसलिए लिखा क्योंकि  मेरे लिए अब ये दिन के तमाम कामों की तरह एक जरूरी काम है। ये विषय अब फ़ैशन या दिखावा नहीं, मेरी आपकी और हर एक इंसान की जिम्मेदारी नहीं धर्म है। इसे पूजा - पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पालन किया जाना अनिवार्य है।


लिली मित्रा


शनिवार, 1 अगस्त 2026

नज़्म


 

फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है

जहद- ए -मुसलसल के बाद

लम्हा - लम्हा तितलियों की कहानी है

दरख्तों की ज़ुबानी है


ख़ुश्क हसरतों पे

बादलों की मेहरबानी है

रेज़ा रेज़ा ये बारिश

सेहरा पे बागवानी है...

गुज़रती मसर्रत से ज़िंदगानी है


फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

आलू








 अपनी प्यारी आलू जी

कितनी सुन्दर प्यारू जी


मटक मटक कर चलती हो

कजरारी आंखें मलती हो


इनको कोई काम न धाम

दिन भर सोए करे आराम


नाममात्र की करती सैर

पसार के बैठे अपने पैर


पसंद कलेजी और मटन

चाट के मूंछें हो जाती टन्न


बना के भोला अपना मुँह

हिला पूँछ करती कूं - कूं


पैर उठाकर देती है पॉ

हैलो करने का ये इनका लॉ


प्यार सभी का चाहिए खूब

जितना भी दो नहीं है ऊब


वैसे दिखती सीधी है

लेकिन गैंग की दीदी है


दौड़ लगाए झटर पटर

होता जब कोई भी मैटर


फिर पड़े लद्द से आलू जी

मोटू मोटू भालू जी


प्यारी प्यारी आलू जी

अपनी सुंदर आलू जी

मंगलवार, 16 जून 2026

बादल


चित्र : साभार गूगल

मैंने पकड़ा नहीं है

बादलों को

अपनी मुट्ठियों में कभी

मैं बस देखती हूँ आस भरी

 निगाहों से

नीले आकाश पर तैरते हुए

या,पहाड़ों की चोटियों से

लिपटकर गुज़रते हुए,

सुना है वे छूकर गुज़रते हैं

तो भीगा जाते हैं

अपनी आर्द्रता से

मैंने कभी तुमको भी नहीं

पकड़ा अपनी हथेलियों से,

बस देखती रहती हूँ

तैरते हुए बादलों की तरह

अपने प्रेमाकाश पर

चाहती हूँ बन जाना किसी

 पर्वत का शिखर

चाहती हूँ तुम लिपट कर

 भिगा दो मुझे भी।

अदृश्य तुम






 कविता से जब 'तुम' हो जाता है अदृश्य

तो बचती हैं-

खुली हुई खिड़कियाँ...

खुले हुए दरवाज़े...

भरे हुए बादल सा भरा हुआ मन...

कल्पनाओं का कोरा संसार..

खुली डायरी के फड़फड़ाते पन्ने...

विचारों की निरर्थकता...

उदासीनता का महत्व...

ठहराव का सत्य...

जीवन का बहाव...

अस्तित्व का एकांत बन जाता है

एक शुरुवात का मार्मिक अंत।

तब लिखी नहीं जाती

कविताएँ ...

आ जाता है उन्हें जीना

सही मायने में..

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

मुक्तियां


 


एक बात कहूँ-
मैं आजकल सब भूल जाती हूँ
दिन भूल जाती हूँ
तारीखें भूल जाती हूँ
घटनाएँ भूल जाती हूँ
यहाँ तक कि-
कुछ सोचते हुए अपने ही विचारों
के क्रम भूल जाती हूँ,

कहते-कहते किसी बात को,
उसके कहने का प्रयोजन भी
भूल जाती हूँ
और सच कहूँ तो-
मैं बहुत संतुष्ट हूँ अपनी इन 'मुक्तियों' से

उन्मुक्ति की ओर बढ़ते
मेरे कदम
मानों 'परों' में तब्दील
होते महसूस हो रहे
मेरा आकाश तैयार हो रहा है शायद

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

हे बसंत !


 


हे बसंत!

तुम पलाश की आग में 

सुलगते हुए

पक्षियों के कलरव से

भरे हुए

नीले आकाश की स्पष्टता 

से परिष्कृत 

पुष्प सौरभ से सुरभित

हवा से आंदोलित 

कैसे झर जाते हो 

गोरी के फैले आंचल में!

कैसे ठहर जाते हो 

मन के चंचल आंगन में!

कैसे छनक जाते हो 

स्मृति की टूटी पायल में!

हे बसंत! 

तुम आते हो उल्लास का उजास

रंग ,सुगंध का आभास लिए

चले जाते हो शुष्क  पतझड़

का विरही आलाप दे कर

तुम्हारी प्रतीक्षा में पाषाण हुआ 

मेरे मन का एक कोना

बन चुका है तुम्हारी 

मधुर स्मृतियों का भग्नावशेष

लिली ,🌺

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

मेरे बोगनवेलिया के लिए


 


तुम्हारे मेरे बीच कोई ऐसा दरवाज़ा नहीं है
जिससे कहीं आया और जाया 
जा सके
यहां सिर्फ एक विस्तृत फैला मैदान है
जिनके दरवाजे से
तुम्हारा जाना 
दिखता नहीं है ..
महसूस होता है
एक गहरे सुनसान सन्नाटे सा...
तुम्हारा आना 
किसी काठ के किवाड़ पर 
खटखटाहट सा नहीं सुनाई देता
वो तो खनक उठता है मेरे दिल में
एहसास की दस्तक से
और मेरी धड़कन गा उठती है...

कोई आया धड़कन कहती है

लिली

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

जाओ प्रेम जाओ...



 

प्रेम का कोई आकार होता है?

मैं कहूँगी नही...

प्रेम की कोई परिभाषा होती है?

मैं कहूँगी नही..

प्रेमी को प्रगल्भता की आवश्यकता होती है?

तो भी मैं कहूँगी.. नही...

प्रेम की अभिव्यक्ति का कोई व्याकरण होता है?

मैं कहूंगी बिल्कुल भी नही।

इस चिर अमूर्तन का सिर्फ मूर्तिकरण करते हम

प्रयासरत हैं, असीम को सीमाबद्ध करने में,

घटनाओं से तथ्य, तथ्य से तर्क 

और तर्क से विज्ञान गढ़ने में,

विचार को अनुभूति, अनुभूति को अभिव्यक्ति,

और अभिव्यक्ति का प्रचार कर 

प्रेम का व्यापार करने में।

मुझे लगता है इसे छोड़ देना चाहिए

चेतन अचेतन के धरातल पर

कभी उड़ते हुए.. कभी बहते हुए..

कभी दृश्य ,कभी अदृश्य... कभी श्वेत कभी सप्तरंगी होते हुए

चाहती हूँ न लिखूँ फिर कोई प्रेम कविता

चाहती हूँ प्रेम को स्वच्छंद कर देना, 

अपने सीमित साधनों की बेड़ियों से मुक्त कर देना

अब सब कुछ उस पर हो

वो चाहेगा तो करेगा आलिंगनबद्ध 

वो चाहेगा तो अधरों पर लेप जाएगा मधु

वो चाहेगा बहने लगेगा बनकर अश्रु , भर देगा नयन समंदर से

वो चाहेगा तो हृदय वाटिका पर छा जाएगा

बसंत बनकर या फिर,

बन जाएगा विरह का क्लांत पतझड़,

ढाई अक्षरों के क्रूर कटीले पाश से

खोलकर उसे उड़ा देना चाहती हूँ - 

नीलाभ में... बहा देना चाहती हूँ निश्चल 

किल्लोली प्रपात में

जाओ प्रेम जाओ!

तुम आज़ाद हो

मैं समझती हूँ अब अच्छे से 

पुतले में प्राण फूंकना चमत्कार नहीं 

अभिशाप है...

लिली 

बुधवार, 28 जनवरी 2026

गपाष्टक (लिली के लिलियापे)


 


अजय कुमार जी की समीक्षा 


जितना मैंने इस किताब को समझा

*****************************


           अपनी बात शुरू करता हूं मैं गपाष्टक के इस कथन से..कि- 

"जो लोग कहते हैं...वो आप नहीं होते हैं

और जैसे आप होते हैं..वैसे लोगों तक कभी पहुंचना 

नहीं चाहते....

 यह बात लगेगी एक छल्ले सी पर दरअसल है एक सीधी रेखा..."

अब क्या सचमुच रोज छल्लों जैसी बनती उलझती इस जिंदगी को..शब्दों की एक सरल रेखा में व्यक्त किया जा सकता है,क्या खुद को..अपने लिखने से अपनी किताब के माध्यम से ऐसे पेश किया जा सकता है कि यह लगे आपने एक रेशमी रूमाल में ऐहतियात से एक बुझता मगर अंदर से सुलगता एक अंगारा लपेट दिया है.. और मेरी समझ में...ठीक यही करने की कोशिश की है लिली मित्रा जी ने अपनी इस किताब गपाष्टक में..जिंदगी की इस "कटहली वेदना' को कभी तंज..कभी व्यंग्य और कभी हास्य के साथ पेश करके....।

             लिली मित्रा एक लेखक हैं...और पाक कला 

में निपुण महिला भी..तो उन्होंने अपनी इस द्विगुणित प्रतिभा को इस किताब गपाष्टक में अपनी किचन में एक भरवां करेले की तरह अंदर एक चटपटा मसाला भरकर अपनी समझ के धागे से लपेटकर अच्छे से पकाया है..यह धागा कभी अपनी समझ का है..कभी ऊब का है..कोफ्त का है..खिसियाहट का है और कहीं कहीं एक शिकायत का भी है..जिसे सावधानी से.. गपाष्टक और लिलियापे की स्टफिंग के साथ...अपनी हल्की फुल्की शैली से गार्निशिंग करके,एक साफ धुली और चमकती प्लेट..(जो चित्र हैं किताब में )पर परोसा गया है...।

एक बात जो शायद बाद में कहने से रह जाये वो है इस किताब का सुरूचिपूर्ण कलेवर...और उसके लाजवाब बोलते बतियाते चित्र...पहले कभी टाइम्स ऑफ इन्डिया में आर.के. लक्षमण के सरल सहज चुभते व्यंग्यों जो आम आदमी के माध्यम से राजनैतिक व्यवस्था और मध्यमवर्गीय पिसती जिंदगी के ताज़ा हाल जैसे होते थे..कुछ कुछ वही अंदाज और तरीका.. लिली जी ने सौरभ जी के प्रवीण चित्र कौशल के साथ पेश करने की कोशिश की है..मगर इस बार केंद्र में एक मध्यवर्गीय महिला है.. जिसमें कभी घर से और कभी उसके सहन से...कभी किचन से और कभी सड़क पर चलते आस पास की हर चीज़ का अपनी तरह जायजा लेती एक नज़र है और सबसे जो अच्छी बात मुझे लगी वो है किताब के बारे में लिली जी के हमसफर प्रियदर्शी जी का ठोस एन्डोर्समैंट..मतलब एक फुल फैमिली प्रयास।

           किताब की कुछ पंक्तियों को कुछ उदाहरणों की तरह आपके सामने रख कर मैं अपनी बात थोड़ी साफ करता हूं..चावल,दूध,चीनी से मिलकर बनी खीर यदि उबल कर गैस पर फैल जाए..तो रगड़ रगड़ कर साफ करने को तैयार रहिए..

भाटरमेलन में अपनी सारी सावधानी के बावजूद खाते वक्त कोई बीज मुंह में आ जाए तो उसे 'नटी' समझ कर खा जाइये..

किचन में यदि मोबाइल पर चैट करते हुए कोफ्तों का सत्यानाश हो जाए और डाइनिंगटेबुल पर जले हुए कोफ्तों की बात चले तो..और बात भी गर जलने लगे..तो आप समय रहते ही उसे सावधानी से पलट दें..

किसी महिला की जिंदगी में पहला क्रश..अदरक,काली मिर्च कूटना भी होता है..

कभी कॉफी,चाय ,नाश्ता और दूसरे रोजमर्रा के काम यदि बहुत चुभने लगें तो खुद को शोले के 'हाथ कटे' ठाकुर की तरह देखने की एक निर्दोष सी कामना होने लगती है 

या अपनी हैसियत घर की मुर्गी दाल बराबर लगे तो एक मुर्गी की तरह जिन्दगी की कढ़ाई से पक पकाक करते भाग निकलिए...

  एक और सबसे महत्वपूर्ण खंड है इस किताब का... 

जो है लघु पर पूरी किताब पर भारी है...और वो है... शायर'अ' डेंजर प्रजाति..'होश' से बढ़ कर कोई गुनाह नहीं जो मस्त है वो होशियार निकला...खूब ख़बर ली है लिली जी ने इस शायराना अध्यात्म की और इस बहाने खुद अपनी...'रेन डांस' करने के बाद कमरे में भरे पानी को वाइपर से समेटना...

चांद शरमा जायेगा चांदनी रात में यूं जुल्फें न अपनी संवारा करो..यह सुन कर यह कहना मतलब हम "हॉलोविन डायन" की तरह बाल बिखेरे फिरती रहें...याद रखना चाहिए लिली जी खुद एक कवयित्री हैं..उनके ये वाक्य जैसे सब कुछ कह जाते हैं...और सार.. जिन्नगी भाटरमेलन है बाकी सब माया मोह..मतलब कहीं सुख का गूदा है तो कहीं आपका स्वाद बिगाड़ते.. उसके दुख रूप बीज..जिन्हें नटी  समझ कर चबाते रहना ही जिंदगी है...

       सच कहूं यह किताब मुझे उनकी पहली किताब "अतृप्ता" की एक प्रतिध्वनि लगी...जहां वो किताब उनके अन्तस की गहराइयों से निकली.. एक नारी की शाश्वत पीड़ा का चुभता बोध है.. तो यह किताब बाहर चलती जिंदगी का रोजमर्रा का स्यापा है जो सड़क पर मिले गढ्ढे..स्कूटर पर आ पड़ी 'पीक' या व्यर्थ मनते..

नारी दिवस और स्टीरियोटाइप "स्त्री विमर्श "से उपजी है...जिसे वो बेवज़ह लिलियापा कहती हैं..जबकि उस की अपनी एक ख़ास वज़ह है....जाहिर है वो बेवज़ह की वज़ह होती है मगर शायद नहीं भी होती....

**********************

अजय कुमार

सोमवार, 19 जनवरी 2026

भूलते जाने के सफर में


 


मैं आजकल बहुत भूलने लगी हूँ, 

कोशिश भी नहीं करना चाहती की सब कुछ करीने से याद रख सकूं। 

कभी कभी बहुत हल्का महसूस होता है कि - चलो दिल और दिमाग पर जोर नहीं पड़ता। 

जो बीत गया उसे क्या याद रखना ? 

नाम भूल जाना ,

 तारीखें भूल जाना, 

 कहीं बहुत एतिहात से रखा सामान भूल जाना, 

पुरानी कई महत्वपूर्ण घटनाएं भूल जाना ,

कही हुई बातें भूल जाना, पढ़ी हुई कहानियों को भूल जाना वगैरह वगैरह...

भूल जाने के इस लंबे क्रम में थोड़ा बहुत खुद को भी भूलती जाना। 

ऐसा लगता है अंदर कितनी जगह बनती जा रही है, कितने मर्तबान खाली होते जा रहे हैं.. 

वज़न कम और जिस्म हल्का होता जा रहा है।

भूलने के इस क्रम में कितने ही कैद परिंदों को आज़ाद कर दिया है मैने, 

खुले आसमान में उड़ने की मेरी अपनी ख्वाहिश जैसे अब पूरी होने को है। 

मैं एक दिन जमीन से उठ कर बैठ जाऊंगी किसी हरियाले पेड़ की सबसे ऊंची शाख पर, 

और फिर किसी खुशगवार दिन, 

भर कर एक गहरी सुकून भरी सांस फैला दूंगी अपने डैने .. 

और उड़ जाऊंगी आसमान में। 

बहुत सारे इंतजार में एक ये वाला इंतजार भी है शामिल।

मुझे दुनिया में कोई क्रांति लाने की चाह नहीं, 

किसी नए बदलाव की चाह नहीं, 

मैने कोई उम्मीद नहीं लगाई है किसी चमत्कारी परिवर्तन की,

मुझे किसी बहस में नहीं दिखाना है अपना वाकचातुर्य। 

मैं तो इस भूलने के सफर पर चलते हुए बन जाना चाहती हूँ एक चिड़िया 

और हो जाना चाहती हूँ फुर्र.... 

लिली 🐦