शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

हे बसंत !


 


हे बसंत!

तुम पलाश की आग में 

सुलगते हुए

पक्षियों के कलरव से

भरे हुए

नीले आकाश की स्पष्टता 

से परिष्कृत 

पुष्प सौरभ से सुरभित

हवा से आंदोलित 

कैसे झर जाते हो 

गोरी के फैले आंचल में!

कैसे ठहर जाते हो 

मन के चंचल आंगन में!

कैसे छनक जाते हो 

स्मृति की टूटी पायल में!

हे बसंत! 

तुम आते हो उल्लास का उजास

रंग ,सुगंध का आभास लिए

चले जाते हो शुष्क  पतझड़

का विरही आलाप दे कर

तुम्हारी प्रतीक्षा में पाषाण हुआ 

मेरे मन का एक कोना

बन चुका है तुम्हारी 

मधुर स्मृतियों का भग्नावशेष

लिली ,🌺

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