गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

जाओ प्रेम जाओ...



 

प्रेम का कोई आकार होता है?

मैं कहूँगी नही...

प्रेम की कोई परिभाषा होती है?

मैं कहूँगी नही..

प्रेमी को प्रगल्भता की आवश्यकता होती है?

तो भी मैं कहूँगी.. नही...

प्रेम की अभिव्यक्ति का कोई व्याकरण होता है?

मैं कहूंगी बिल्कुल भी नही।

इस चिर अमूर्तन का सिर्फ मूर्तिकरण करते हम

प्रयासरत हैं, असीम को सीमाबद्ध करने में,

घटनाओं से तथ्य, तथ्य से तर्क 

और तर्क से विज्ञान गढ़ने में,

विचार को अनुभूति, अनुभूति को अभिव्यक्ति,

और अभिव्यक्ति का प्रचार कर 

प्रेम का व्यापार करने में।

मुझे लगता है इसे छोड़ देना चाहिए

चेतन अचेतन के धरातल पर

कभी उड़ते हुए.. कभी बहते हुए..

कभी दृश्य ,कभी अदृश्य... कभी श्वेत कभी सप्तरंगी होते हुए

चाहती हूँ न लिखूँ फिर कोई प्रेम कविता

चाहती हूँ प्रेम को स्वच्छंद कर देना, 

अपने सीमित साधनों की बेड़ियों से मुक्त कर देना

अब सब कुछ उस पर हो

वो चाहेगा तो करेगा आलिंगनबद्ध 

वो चाहेगा तो अधरों पर लेप जाएगा मधु

वो चाहेगा बहने लगेगा बनकर अश्रु , भर देगा नयन समंदर से

वो चाहेगा तो हृदय वाटिका पर छा जाएगा

बसंत बनकर या फिर,

बन जाएगा विरह का क्लांत पतझड़,

ढाई अक्षरों के क्रूर कटीले पाश से

खोलकर उसे उड़ा देना चाहती हूँ - 

नीलाभ में... बहा देना चाहती हूँ निश्चल 

किल्लोली प्रपात में

जाओ प्रेम जाओ!

तुम आज़ाद हो

मैं समझती हूँ अब अच्छे से 

पुतले में प्राण फूंकना चमत्कार नहीं 

अभिशाप है...

लिली 

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