और ये बिखराव समेट लेता है उदासी,
सुखा देता है अश्क़ ..
बिखर कर ही पराग बनाता है गुलशन,
बिखरने से ही खुश्बू देती है पैगाम बहार के आने का...
और
खुद का बिखरना देता है उम्मीद
कोई समेटा आकर हथेलियों पर बड़े प्यार से,
यूँ भी होता है कि - किरचें किरचें समेटने में कभी कभी
गुज़र जाता है एक दौर
फ़ीके पड़ जाते हैं चोट के निशान
धूल चढ़ जाती है
तकलीफ़ की तकरीरों पर
बिखराव के फैलाव में
निकल आता है छुपा हुआ कुछ नया
जिसे हम नहीं देख पाते बंधन के कसाव में
रिस नहीं पाते जगह के अभाव में..
Lily 🌸






