शनिवार, 4 जुलाई 2026

आलू








 अपनी प्यारी आलू जी

कितनी सुन्दर प्यारू जी


मटक मटक कर चलती हो

कजरारी आंखें मलती हो


इनको कोई काम न धाम

दिन भर सोए करे आराम


नाममात्र की करती सैर

पसार के बैठे अपने पैर


पसंद कलेजी और मटन

चाट के मूंछें हो जाती टन्न


बना के भोला अपना मुँह

हिला पूँछ करती कूं - कूं


पैर उठाकर देती है पॉ

हैलो करने का ये इनका लॉ


प्यार सभी का चाहिए खूब

जितना भी दो नहीं है ऊब


वैसे दिखती सीधी है

लेकिन गैंग की दीदी है


दौड़ लगाए झटर पटर

होता जब कोई भी मैटर


फिर पड़े लद्द से आलू जी

मोटू मोटू भालू जी


प्यारी प्यारी आलू जी

अपनी सुंदर आलू जी

मंगलवार, 16 जून 2026

बादल


चित्र : साभार गूगल

मैंने पकड़ा नहीं है

बादलों को

अपनी मुट्ठियों में कभी

मैं बस देखती हूँ आस भरी

 निगाहों से

नीले आकाश पर तैरते हुए

या,पहाड़ों की चोटियों से

लिपटकर गुज़रते हुए,

सुना है वे छूकर गुज़रते हैं

तो भीगा जाते हैं

अपनी आर्द्रता से

मैंने कभी तुमको भी नहीं

पकड़ा अपनी हथेलियों से,

बस देखती रहती हूँ

तैरते हुए बादलों की तरह

अपने प्रेमाकाश पर

चाहती हूँ बन जाना किसी

 पर्वत का शिखर

चाहती हूँ तुम लिपट कर

 भिगा दो मुझे भी।

अदृश्य तुम






 कविता से जब 'तुम' हो जाता है अदृश्य

तो बचती हैं-

खुली हुई खिड़कियाँ...

खुले हुए दरवाज़े...

भरे हुए बादल सा भरा हुआ मन...

कल्पनाओं का कोरा संसार..

खुली डायरी के फड़फड़ाते पन्ने...

विचारों की निरर्थकता...

उदासीनता का महत्व...

ठहराव का सत्य...

जीवन का बहाव...

अस्तित्व का एकांत बन जाता है

एक शुरुवात का मार्मिक अंत।

तब लिखी नहीं जाती

कविताएँ ...

आ जाता है उन्हें जीना

सही मायने में..

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

मुक्तियां


 


एक बात कहूँ-
मैं आजकल सब भूल जाती हूँ
दिन भूल जाती हूँ
तारीखें भूल जाती हूँ
घटनाएँ भूल जाती हूँ
यहाँ तक कि-
कुछ सोचते हुए अपने ही विचारों
के क्रम भूल जाती हूँ,

कहते-कहते किसी बात को,
उसके कहने का प्रयोजन भी
भूल जाती हूँ
और सच कहूँ तो-
मैं बहुत संतुष्ट हूँ अपनी इन 'मुक्तियों' से

उन्मुक्ति की ओर बढ़ते
मेरे कदम
मानों 'परों' में तब्दील
होते महसूस हो रहे
मेरा आकाश तैयार हो रहा है शायद

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

हे बसंत !


 


हे बसंत!

तुम पलाश की आग में 

सुलगते हुए

पक्षियों के कलरव से

भरे हुए

नीले आकाश की स्पष्टता 

से परिष्कृत 

पुष्प सौरभ से सुरभित

हवा से आंदोलित 

कैसे झर जाते हो 

गोरी के फैले आंचल में!

कैसे ठहर जाते हो 

मन के चंचल आंगन में!

कैसे छनक जाते हो 

स्मृति की टूटी पायल में!

हे बसंत! 

तुम आते हो उल्लास का उजास

रंग ,सुगंध का आभास लिए

चले जाते हो शुष्क  पतझड़

का विरही आलाप दे कर

तुम्हारी प्रतीक्षा में पाषाण हुआ 

मेरे मन का एक कोना

बन चुका है तुम्हारी 

मधुर स्मृतियों का भग्नावशेष

लिली ,🌺

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

मेरे बोगनवेलिया के लिए


 


तुम्हारे मेरे बीच कोई ऐसा दरवाज़ा नहीं है
जिससे कहीं आया और जाया 
जा सके
यहां सिर्फ एक विस्तृत फैला मैदान है
जिनके दरवाजे से
तुम्हारा जाना 
दिखता नहीं है ..
महसूस होता है
एक गहरे सुनसान सन्नाटे सा...
तुम्हारा आना 
किसी काठ के किवाड़ पर 
खटखटाहट सा नहीं सुनाई देता
वो तो खनक उठता है मेरे दिल में
एहसास की दस्तक से
और मेरी धड़कन गा उठती है...

कोई आया धड़कन कहती है

लिली

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

जाओ प्रेम जाओ...



 

प्रेम का कोई आकार होता है?

मैं कहूँगी नही...

प्रेम की कोई परिभाषा होती है?

मैं कहूँगी नही..

प्रेमी को प्रगल्भता की आवश्यकता होती है?

तो भी मैं कहूँगी.. नही...

प्रेम की अभिव्यक्ति का कोई व्याकरण होता है?

मैं कहूंगी बिल्कुल भी नही।

इस चिर अमूर्तन का सिर्फ मूर्तिकरण करते हम

प्रयासरत हैं, असीम को सीमाबद्ध करने में,

घटनाओं से तथ्य, तथ्य से तर्क 

और तर्क से विज्ञान गढ़ने में,

विचार को अनुभूति, अनुभूति को अभिव्यक्ति,

और अभिव्यक्ति का प्रचार कर 

प्रेम का व्यापार करने में।

मुझे लगता है इसे छोड़ देना चाहिए

चेतन अचेतन के धरातल पर

कभी उड़ते हुए.. कभी बहते हुए..

कभी दृश्य ,कभी अदृश्य... कभी श्वेत कभी सप्तरंगी होते हुए

चाहती हूँ न लिखूँ फिर कोई प्रेम कविता

चाहती हूँ प्रेम को स्वच्छंद कर देना, 

अपने सीमित साधनों की बेड़ियों से मुक्त कर देना

अब सब कुछ उस पर हो

वो चाहेगा तो करेगा आलिंगनबद्ध 

वो चाहेगा तो अधरों पर लेप जाएगा मधु

वो चाहेगा बहने लगेगा बनकर अश्रु , भर देगा नयन समंदर से

वो चाहेगा तो हृदय वाटिका पर छा जाएगा

बसंत बनकर या फिर,

बन जाएगा विरह का क्लांत पतझड़,

ढाई अक्षरों के क्रूर कटीले पाश से

खोलकर उसे उड़ा देना चाहती हूँ - 

नीलाभ में... बहा देना चाहती हूँ निश्चल 

किल्लोली प्रपात में

जाओ प्रेम जाओ!

तुम आज़ाद हो

मैं समझती हूँ अब अच्छे से 

पुतले में प्राण फूंकना चमत्कार नहीं 

अभिशाप है...

लिली