बुधवार, 28 अक्टूबर 2026

गीत

 

छुपकर पलकों के पट से 

ढलक गए दृग जल से तुम 

व्याकुल प्रेमिल सघन भाव से 

पथ पर बिखरे हृदय कुसुम 


गुंजित मउमाछी का कलरव

पुष्प पुष्प के कर्णों  में

जैसे तुम खुसफुस हो करते

मधु मिश्रित से वर्णो में

 झंकृत सुर में होकर गुम

पथ पर बिखरे हृदय कुसुम 


छुपकर पलकों के पट से 

ढलक गए दृग जल से तुम 


शरत काल के श्वेत मेघ बन

पवन वेग संग उड़ते हो

थामे स्व में शिशिर आद्रता 

लुक-छिप लुक -छिप करते हो

थिरक उठे हैं जब खग द्रुम 

पथ पर बिखरे हृदय कुसुम 


छुपकर पलकों के पट से 

ढलक गए दृग जल से तुम 

लिली




शनिवार, 24 अक्टूबर 2026

बिखराव


 

और ये बिखराव समेट लेता है उदासी, 

सुखा देता है अश्क़ .. 

बिखर कर ही पराग बनाता है गुलशन,

 बिखरने से ही खुश्बू देती है पैगाम बहार के आने का... 

और 

खुद का बिखरना देता है उम्मीद 

कोई समेटा आकर हथेलियों पर बड़े प्यार से, 

यूँ भी होता है कि - किरचें किरचें समेटने में कभी कभी

गुज़र जाता है एक दौर 

फ़ीके पड़ जाते हैं चोट के निशान

धूल चढ़ जाती है 

तकलीफ़ की तकरीरों पर

बिखराव के फैलाव में 

निकल आता है छुपा हुआ कुछ नया

जिसे हम नहीं देख पाते बंधन के कसाव में

रिस नहीं पाते जगह के अभाव में..


Lily 🌸

मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

विपश्यना

 





देखो !

क्योंकि देखना दिखाता है -

घटित , घटना और घटक।

बनाने,संवारने, सहेजने के

इस उपक्रम में बदल जाता है

दृष्टा का गंतव्य और मंतव्य

प्राप्ति और हानि के बदल जाते हैं आशय

जो हाथ से छूट गया वो बना ही नहीं आपके लिए

और जो प्राप्त हुआ वो आपका था ही नहीं कभी...

कर्तव्य के इस सतत् क्रम में  बनता जाता है

शून्य का एक विशाल वृत्त

जिसकी परिधि से टकराते हुए

बन जाते हो आप बस एक निमित्त मात्र

बनाया हुआ, संवारा हुआ बह जाता है

अपनी राह

और आप शून्य के वृत्त पर

कुरेदते रहते हो धूमिल पड़ चुके अतीत के चित्र

विपश्यना का यह अभ्यास लाभ, यश,अधिकार, पुरस्कार, हार - हताशा, क्षोभ - लोभ, उत्कंठा- व्यग्रता जैसे मनोभावों

की बदल देता है परिभाषा

एक आवश्यक पर्यावरण के पारिवेशिक घटक से

दिखते हैं सब

देखो !

क्योंकि देखना दृष्टा को बनाता है

निर्मोही सृष्टा

समझाता है-

एक निर्धारित सीमा के बाद 


ईश्वर की असमर्थता

लिली

रविवार, 23 अगस्त 2026

चिड़ी ताल


 

मैने बहुत ही सामान्य सी एक इच्छा पाली

जो लगती थी कि बहुत ही छोटी सी बात होगी

पर ऐसा नहीं था - हाँ सच में...!

मैने अपने आंगन की दीवार पर  मिट्टी के दो पात्र रखे

उसमें भरकर रखा पानी ,

और मैं हर रोज़ करने लगी प्रतीक्षा

 नन्ही चिड़ियों की

कोई तो आए तपती झुलसती गर्मी में 

पानी से भरे कटोरे में छपक छपक... चीं चीं... करते हुए खुद को भिगोए, 

नहाए और छितरा दे खूब सारा पानी चारों ओर 

और भरकर तरोताज़ा उड़ान हो जाए फुर्र...

रही रोज़ ताकती -झाँकती मैं..

कभी रसोई की खिड़की से कभी दरवाजे की ओट से।

एक लंबी प्रतीक्षा के बाद -

अब मेरे बनाए छोटे से चिड़ी -ताल में

डुबकी मारती चिड़ियों के चहचहाते झुंड 

मुझे देकर जाते हैं एक उन्मुक्त उच्छ्वास..

एक इत्मीनान भरी मुस्कान ।


मेरे मन की चिड़िया भी 

नहाकर इस सौंधे पानी में

फुर्र हो जाती है इन नन्ही चिड़ियों

के साथ एक उन्मुक्त सफ़र पर


लिली🕊️

गुरुवार, 13 अगस्त 2026

फैशन या दिखावा नहीं हमारी प्राथमिक आवश्यकता है

 




एक अच्छी आदत शुरू न कर पाने के कितने बहाने हम दे पाते हैं, हैरत होती है ! जितने बहाने हम सोचते हैं उतनी देर में शायद वो अच्छी आदत शुरू की जा सकती है... नहीं? मैने ये विचार कई बार किया है। फिर वो चाहे अपने स्वास्थ्य के प्रति अपना कर्तव्य हो या धरती माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने का धर्म हो। और आप यदि बारीकी से सोचें तो पाएंगे कि - अधिकांश लोग इन दोनों ही मामलों में बहुत ढिलाई बरतते हैं।

ऐसा ही एक विषय है जो पृथ्वी की पारिस्थितिकी को बहुत तेजी से विषाक्त बना रहा है - प्लास्टिक कचरा।

      मुझमे ये जागरूकता आई तो चार - पाँच साल पहले पर इसे कार्यरूप में परिणीति मैं इस वर्ष दे पाई। वही बात कि - अच्छी आदतें शुरू न करने के सौ बहाने होते हैं हमारे पास। खैर मेरे इस संकल्प की परिणिति थोड़ी परिश्रमजन्य रही परन्तु परिणाम आत्मिक संतोष से परिपूर्ण है।

    करीब दो साल से मैने रसोई के गीले कचरे जैसे सब्ज़ी के छिलकों, चाय-कॉफी, अंडे के छिलकों आदि से जैविक खाद बनाना शुरू किया अब मुझे अपनी छोटी सी ही सही पर हरी -भरी  बगिया के लिये खाद मिल जाती है।

  इसी तरह अब  प्लास्टिक की पन्नियों, दूध - दही, तेल  की थैलियों, दंत -मंजन , कॉस्मेटिक वाले प्लास्टिक से बने हर तरह के कचरे को धोकर सहेज कर रखने की आदत हो गई है। फिर मैने सोशल मीडिया पर इनके उचित निस्तारण के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का पता लगाया, और अब... मुझे बहुत अच्छा अनुभव हो रहा है...ये सोचकर कि मैं पृथ्वी की पारिस्थितिकी को और बुरी हालत में न जाने देने के लिए अपना अंशदान करने लगी हूँ, देर से ही सही ।

अपनी सोसाइटी में भी मैं इस आवश्यक जागरूकता को लाने का प्रयास करना शुरू किया है पर फिर वही बात... अच्छी आदतें न शुरू कर पाने के सौ बहाने। पर लोगों को ये समझना होगा कि इस विषय पर भाषणबाजी, लेखनबाजी करने का हक़ अब उसी का हो जिसकी दिनचर्या का हिस्सा धरती माँ के खस्ता स्वास्थ्य की तीमारदारी करना हो।

   इस लेख में स्व का उदाहरण सिर्फ इसलिए लिखा क्योंकि  मेरे लिए अब ये दिन के तमाम कामों की तरह एक जरूरी काम है। ये विषय अब फ़ैशन या दिखावा नहीं, मेरी आपकी और हर एक इंसान की जिम्मेदारी नहीं धर्म है। इसे पूजा - पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पालन किया जाना अनिवार्य है।


लिली मित्रा


शनिवार, 1 अगस्त 2026

नज़्म


 

फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है

जहद- ए -मुसलसल के बाद

लम्हा - लम्हा तितलियों की कहानी है

दरख्तों की ज़ुबानी है


ख़ुश्क हसरतों पे

बादलों की मेहरबानी है

रेज़ा रेज़ा ये बारिश

सेहरा पे बागवानी है...

गुज़रती मसर्रत से ज़िंदगानी है


फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

आलू








 अपनी प्यारी आलू जी

कितनी सुन्दर प्यारू जी


मटक मटक कर चलती हो

कजरारी आंखें मलती हो


इनको कोई काम न धाम

दिन भर सोए करे आराम


नाममात्र की करती सैर

पसार के बैठे अपने पैर


पसंद कलेजी और मटन

चाट के मूंछें हो जाती टन्न


बना के भोला अपना मुँह

हिला पूँछ करती कूं - कूं


पैर उठाकर देती है पॉ

हैलो करने का ये इनका लॉ


प्यार सभी का चाहिए खूब

जितना भी दो नहीं है ऊब


वैसे दिखती सीधी है

लेकिन गैंग की दीदी है


दौड़ लगाए झटर पटर

होता जब कोई भी मैटर


फिर पड़े लद्द से आलू जी

मोटू मोटू भालू जी


प्यारी प्यारी आलू जी

अपनी सुंदर आलू जी