शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

हे बसंत !


 


हे बसंत!

तुम पलाश की आग में 

सुलगते हुए

पक्षियों के कलरव से

भरे हुए

नीले आकाश की स्पष्टता 

से परिष्कृत 

पुष्प सौरभ से सुरभित

हवा से आंदोलित 

कैसे झर जाते हो 

गोरी के फैले आंचल में!

कैसे ठहर जाते हो 

मन के चंचल आंगन में!

कैसे छनक जाते हो 

स्मृति की टूटी पायल में!

हे बसंत! 

तुम आते हो उल्लास का उजास

रंग ,सुगंध का आभास लिए

चले जाते हो शुष्क  पतझड़

का विरही आलाप दे कर

तुम्हारी प्रतीक्षा में पाषाण हुआ 

मेरे मन का एक कोना

बन चुका है तुम्हारी 

मधुर स्मृतियों का भग्नावशेष

लिली ,🌺

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2026

मेरे बोगनवेलिया के लिए


 


तुम्हारे मेरे बीच कोई ऐसा दरवाज़ा नहीं है
जिससे कहीं आया और जाया 
जा सके
यहां सिर्फ एक विस्तृत फैला मैदान है
जिनके दरवाजे से
तुम्हारा जाना 
दिखता नहीं है ..
महसूस होता है
एक गहरे सुनसान सन्नाटे सा...
तुम्हारा आना 
किसी काठ के किवाड़ पर 
खटखटाहट सा नहीं सुनाई देता
वो तो खनक उठता है मेरे दिल में
एहसास की दस्तक से
और मेरी धड़कन गा उठती है...

कोई आया धड़कन कहती है

लिली

गुरुवार, 12 फ़रवरी 2026

जाओ प्रेम जाओ...



 

प्रेम का कोई आकार होता है?

मैं कहूँगी नही...

प्रेम की कोई परिभाषा होती है?

मैं कहूँगी नही..

प्रेमी को प्रगल्भता की आवश्यकता होती है?

तो भी मैं कहूँगी.. नही...

प्रेम की अभिव्यक्ति का कोई व्याकरण होता है?

मैं कहूंगी बिल्कुल भी नही।

इस चिर अमूर्तन का सिर्फ मूर्तिकरण करते हम

प्रयासरत हैं, असीम को सीमाबद्ध करने में,

घटनाओं से तथ्य, तथ्य से तर्क 

और तर्क से विज्ञान गढ़ने में,

विचार को अनुभूति, अनुभूति को अभिव्यक्ति,

और अभिव्यक्ति का प्रचार कर 

प्रेम का व्यापार करने में।

मुझे लगता है इसे छोड़ देना चाहिए

चेतन अचेतन के धरातल पर

कभी उड़ते हुए.. कभी बहते हुए..

कभी दृश्य ,कभी अदृश्य... कभी श्वेत कभी सप्तरंगी होते हुए

चाहती हूँ न लिखूँ फिर कोई प्रेम कविता

चाहती हूँ प्रेम को स्वच्छंद कर देना, 

अपने सीमित साधनों की बेड़ियों से मुक्त कर देना

अब सब कुछ उस पर हो

वो चाहेगा तो करेगा आलिंगनबद्ध 

वो चाहेगा तो अधरों पर लेप जाएगा मधु

वो चाहेगा बहने लगेगा बनकर अश्रु , भर देगा नयन समंदर से

वो चाहेगा तो हृदय वाटिका पर छा जाएगा

बसंत बनकर या फिर,

बन जाएगा विरह का क्लांत पतझड़,

ढाई अक्षरों के क्रूर कटीले पाश से

खोलकर उसे उड़ा देना चाहती हूँ - 

नीलाभ में... बहा देना चाहती हूँ निश्चल 

किल्लोली प्रपात में

जाओ प्रेम जाओ!

तुम आज़ाद हो

मैं समझती हूँ अब अच्छे से 

पुतले में प्राण फूंकना चमत्कार नहीं 

अभिशाप है...

लिली 

बुधवार, 28 जनवरी 2026

गपाष्टक (लिली के लिलियापे)


 


अजय कुमार जी की समीक्षा 


जितना मैंने इस किताब को समझा

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           अपनी बात शुरू करता हूं मैं गपाष्टक के इस कथन से..कि- 

"जो लोग कहते हैं...वो आप नहीं होते हैं

और जैसे आप होते हैं..वैसे लोगों तक कभी पहुंचना 

नहीं चाहते....

 यह बात लगेगी एक छल्ले सी पर दरअसल है एक सीधी रेखा..."

अब क्या सचमुच रोज छल्लों जैसी बनती उलझती इस जिंदगी को..शब्दों की एक सरल रेखा में व्यक्त किया जा सकता है,क्या खुद को..अपने लिखने से अपनी किताब के माध्यम से ऐसे पेश किया जा सकता है कि यह लगे आपने एक रेशमी रूमाल में ऐहतियात से एक बुझता मगर अंदर से सुलगता एक अंगारा लपेट दिया है.. और मेरी समझ में...ठीक यही करने की कोशिश की है लिली मित्रा जी ने अपनी इस किताब गपाष्टक में..जिंदगी की इस "कटहली वेदना' को कभी तंज..कभी व्यंग्य और कभी हास्य के साथ पेश करके....।

             लिली मित्रा एक लेखक हैं...और पाक कला 

में निपुण महिला भी..तो उन्होंने अपनी इस द्विगुणित प्रतिभा को इस किताब गपाष्टक में अपनी किचन में एक भरवां करेले की तरह अंदर एक चटपटा मसाला भरकर अपनी समझ के धागे से लपेटकर अच्छे से पकाया है..यह धागा कभी अपनी समझ का है..कभी ऊब का है..कोफ्त का है..खिसियाहट का है और कहीं कहीं एक शिकायत का भी है..जिसे सावधानी से.. गपाष्टक और लिलियापे की स्टफिंग के साथ...अपनी हल्की फुल्की शैली से गार्निशिंग करके,एक साफ धुली और चमकती प्लेट..(जो चित्र हैं किताब में )पर परोसा गया है...।

एक बात जो शायद बाद में कहने से रह जाये वो है इस किताब का सुरूचिपूर्ण कलेवर...और उसके लाजवाब बोलते बतियाते चित्र...पहले कभी टाइम्स ऑफ इन्डिया में आर.के. लक्षमण के सरल सहज चुभते व्यंग्यों जो आम आदमी के माध्यम से राजनैतिक व्यवस्था और मध्यमवर्गीय पिसती जिंदगी के ताज़ा हाल जैसे होते थे..कुछ कुछ वही अंदाज और तरीका.. लिली जी ने सौरभ जी के प्रवीण चित्र कौशल के साथ पेश करने की कोशिश की है..मगर इस बार केंद्र में एक मध्यवर्गीय महिला है.. जिसमें कभी घर से और कभी उसके सहन से...कभी किचन से और कभी सड़क पर चलते आस पास की हर चीज़ का अपनी तरह जायजा लेती एक नज़र है और सबसे जो अच्छी बात मुझे लगी वो है किताब के बारे में लिली जी के हमसफर प्रियदर्शी जी का ठोस एन्डोर्समैंट..मतलब एक फुल फैमिली प्रयास।

           किताब की कुछ पंक्तियों को कुछ उदाहरणों की तरह आपके सामने रख कर मैं अपनी बात थोड़ी साफ करता हूं..चावल,दूध,चीनी से मिलकर बनी खीर यदि उबल कर गैस पर फैल जाए..तो रगड़ रगड़ कर साफ करने को तैयार रहिए..

भाटरमेलन में अपनी सारी सावधानी के बावजूद खाते वक्त कोई बीज मुंह में आ जाए तो उसे 'नटी' समझ कर खा जाइये..

किचन में यदि मोबाइल पर चैट करते हुए कोफ्तों का सत्यानाश हो जाए और डाइनिंगटेबुल पर जले हुए कोफ्तों की बात चले तो..और बात भी गर जलने लगे..तो आप समय रहते ही उसे सावधानी से पलट दें..

किसी महिला की जिंदगी में पहला क्रश..अदरक,काली मिर्च कूटना भी होता है..

कभी कॉफी,चाय ,नाश्ता और दूसरे रोजमर्रा के काम यदि बहुत चुभने लगें तो खुद को शोले के 'हाथ कटे' ठाकुर की तरह देखने की एक निर्दोष सी कामना होने लगती है 

या अपनी हैसियत घर की मुर्गी दाल बराबर लगे तो एक मुर्गी की तरह जिन्दगी की कढ़ाई से पक पकाक करते भाग निकलिए...

  एक और सबसे महत्वपूर्ण खंड है इस किताब का... 

जो है लघु पर पूरी किताब पर भारी है...और वो है... शायर'अ' डेंजर प्रजाति..'होश' से बढ़ कर कोई गुनाह नहीं जो मस्त है वो होशियार निकला...खूब ख़बर ली है लिली जी ने इस शायराना अध्यात्म की और इस बहाने खुद अपनी...'रेन डांस' करने के बाद कमरे में भरे पानी को वाइपर से समेटना...

चांद शरमा जायेगा चांदनी रात में यूं जुल्फें न अपनी संवारा करो..यह सुन कर यह कहना मतलब हम "हॉलोविन डायन" की तरह बाल बिखेरे फिरती रहें...याद रखना चाहिए लिली जी खुद एक कवयित्री हैं..उनके ये वाक्य जैसे सब कुछ कह जाते हैं...और सार.. जिन्नगी भाटरमेलन है बाकी सब माया मोह..मतलब कहीं सुख का गूदा है तो कहीं आपका स्वाद बिगाड़ते.. उसके दुख रूप बीज..जिन्हें नटी  समझ कर चबाते रहना ही जिंदगी है...

       सच कहूं यह किताब मुझे उनकी पहली किताब "अतृप्ता" की एक प्रतिध्वनि लगी...जहां वो किताब उनके अन्तस की गहराइयों से निकली.. एक नारी की शाश्वत पीड़ा का चुभता बोध है.. तो यह किताब बाहर चलती जिंदगी का रोजमर्रा का स्यापा है जो सड़क पर मिले गढ्ढे..स्कूटर पर आ पड़ी 'पीक' या व्यर्थ मनते..

नारी दिवस और स्टीरियोटाइप "स्त्री विमर्श "से उपजी है...जिसे वो बेवज़ह लिलियापा कहती हैं..जबकि उस की अपनी एक ख़ास वज़ह है....जाहिर है वो बेवज़ह की वज़ह होती है मगर शायद नहीं भी होती....

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अजय कुमार

सोमवार, 19 जनवरी 2026

भूलते जाने के सफर में


 


मैं आजकल बहुत भूलने लगी हूँ, 

कोशिश भी नहीं करना चाहती की सब कुछ करीने से याद रख सकूं। 

कभी कभी बहुत हल्का महसूस होता है कि - चलो दिल और दिमाग पर जोर नहीं पड़ता। 

जो बीत गया उसे क्या याद रखना ? 

नाम भूल जाना ,

 तारीखें भूल जाना, 

 कहीं बहुत एतिहात से रखा सामान भूल जाना, 

पुरानी कई महत्वपूर्ण घटनाएं भूल जाना ,

कही हुई बातें भूल जाना, पढ़ी हुई कहानियों को भूल जाना वगैरह वगैरह...

भूल जाने के इस लंबे क्रम में थोड़ा बहुत खुद को भी भूलती जाना। 

ऐसा लगता है अंदर कितनी जगह बनती जा रही है, कितने मर्तबान खाली होते जा रहे हैं.. 

वज़न कम और जिस्म हल्का होता जा रहा है।

भूलने के इस क्रम में कितने ही कैद परिंदों को आज़ाद कर दिया है मैने, 

खुले आसमान में उड़ने की मेरी अपनी ख्वाहिश जैसे अब पूरी होने को है। 

मैं एक दिन जमीन से उठ कर बैठ जाऊंगी किसी हरियाले पेड़ की सबसे ऊंची शाख पर, 

और फिर किसी खुशगवार दिन, 

भर कर एक गहरी सुकून भरी सांस फैला दूंगी अपने डैने .. 

और उड़ जाऊंगी आसमान में। 

बहुत सारे इंतजार में एक ये वाला इंतजार भी है शामिल।

मुझे दुनिया में कोई क्रांति लाने की चाह नहीं, 

किसी नए बदलाव की चाह नहीं, 

मैने कोई उम्मीद नहीं लगाई है किसी चमत्कारी परिवर्तन की,

मुझे किसी बहस में नहीं दिखाना है अपना वाकचातुर्य। 

मैं तो इस भूलने के सफर पर चलते हुए बन जाना चाहती हूँ एक चिड़िया 

और हो जाना चाहती हूँ फुर्र.... 

लिली 🐦

शनिवार, 13 सितंबर 2025

मैं देवी नहीं हूँ तुम्हारी




 प्रस्तर की दमघोटू वर्जनाओं को 

तोड़ अपने खुले लहराते केशो में 

टांक कर स्वप्निल तारे

अपनी जमीन और अपना आसमान

खुद तराशती - मैं अब तुम्हारी देवी नहीं हूँ...

मुझे नहीं चाहिए -

आराधना के अभिमंत्रित पुष्प 

होम की शुद्ध की गई वेदी

नैवेद्य का दान

क्योंकि मैं जान चुकी हूँ 

पूजा में छुपा पाखंड

दान में छुपा दोहन

लोबान के सुगंधित धूम्र का 

भ्रमजाल...

मैने जान लिया है 

मानवीय इच्छाओं के उचकने का कौतूहल

छलकती संवेदनाओं को बहा देने का मर्म

दबी कुंठाओं को उलीच देने का सुकून

अपने लिए जीने का आनंद

मैं मुक्त हूँ संस्कृति और मर्यादा के

बोझिल दायित्व से क्योंकि - 

मैं अब देवी नहीं हूँ तुम्हारी

मैं अब देवी नहीं हूँ तुम्हारी 

लिली

शुक्रवार, 5 सितंबर 2025

चुप का अरण्य


 

चुप्पी को चुपचाप बैठ कर इस हद तक संवारा जाए-

'बातें' करने लगें खुसफुसाहट... घबराएं लब खोलने से

जमा करते-करते बहुत से जज़्बात एक दिन

बना डालें खुद को पहाड़

उग जाएंगे 'न कह पाए' बीजों से कितने ही पेड़

बन जाएगा एक हरियाला सा जंगल

जहां दर्द की चिड़ियां सुनाती फिरेंगी

गीत अपनी चहचहाट में

भाव सारे बन जाएंगे एक दरिया

वे भूल जाएंगे आँखों का रास्ता और बहने लगेंगे

पहाड़ों और जंगलों के बीच अपनी एक अलग राह बनाते हुए

उम्मीद का सूरज नहीं पहुंच पाएगा इन सदाबहारी जंगलों की दुर्दांत घनी छांव के पार जमीन तक,

पनपने लगेगा विचारों का एक अलग ही संसार-

कीट पतंगों और जीवों का

भुला दी जाएं मनुष्य निर्मित, भावों और संवेदनाओं को दिए गए जटिल नाम ..परिभाषाएं...और अर्थ

सरल होगा यहां सब कुछ ...क्यों.. क्या.. कैसे..किसलिए..से परे

जो है वही देखा जाएगा, वहीं समझा जाएगा

कोई परत नहीं होगी देखने और समझने के बीच..

मन को नहीं करनी होगी खुद को कुचलने की कोशिश

गा सकेगा दर्द चिड़ियों के साथ

वो बह सकेगा दरिया के साथ

उड़ सकेगा हवा के साथ

अरझ जाएगा किसी पेड़ की शाख से

बाहर की खिचपिचाती दुनिया के

झमेलों से बचकर

तितली बन कर उड़ता रहेगा

परों पर रंगो को सजाए

चंचलता की सभी हदों को पार करता हुआ

चुप के अरण्य में...

लिली