गुरुवार, 13 अगस्त 2026

फैशन या दिखावा नहीं हमारी प्राथमिक आवश्यकता है

 




एक अच्छी आदत शुरू न कर पाने के कितने बहाने हम दे पाते हैं, हैरत होती है ! जितने बहाने हम सोचते हैं उतनी देर में शायद वो अच्छी आदत शुरू की जा सकती है... नहीं? मैने ये विचार कई बार किया है। फिर वो चाहे अपने स्वास्थ्य के प्रति अपना कर्तव्य हो या धरती माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने का धर्म हो। और आप यदि बारीकी से सोचें तो पाएंगे कि - अधिकांश लोग इन दोनों ही मामलों में बहुत ढिलाई बरतते हैं।

ऐसा ही एक विषय है जो पृथ्वी की पारिस्थितिकी को बहुत तेजी से विषाक्त बना रहा है - प्लास्टिक कचरा।

      मुझमे ये जागरूकता आई तो चार - पाँच साल पहले पर इसे कार्यरूप में परिणीति मैं इस वर्ष दे पाई। वही बात कि - अच्छी आदतें शुरू न करने के सौ बहाने होते हैं हमारे पास। खैर मेरे इस संकल्प की परिणिति थोड़ी परिश्रमजन्य रही परन्तु परिणाम आत्मिक संतोष से परिपूर्ण है।

    करीब दो साल से मैने रसोई के गीले कचरे जैसे सब्ज़ी के छिलकों, चाय-कॉफी, अंडे के छिलकों आदि से जैविक खाद बनाना शुरू किया अब मुझे अपनी छोटी सी ही सही पर हरी -भरी  बगिया के लिये खाद मिल जाती है।

  इसी तरह अब  प्लास्टिक की पन्नियों, दूध - दही, तेल  की थैलियों, दंत -मंजन , कॉस्मेटिक वाले प्लास्टिक से बने हर तरह के कचरे को धोकर सहेज कर रखने की आदत हो गई है। फिर मैने सोशल मीडिया पर इनके उचित निस्तारण के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का पता लगाया, और अब... मुझे बहुत अच्छा अनुभव हो रहा है...ये सोचकर कि मैं पृथ्वी की पारिस्थितिकी को और बुरी हालत में न जाने देने के लिए अपना अंशदान करने लगी हूँ, देर से ही सही ।

अपनी सोसाइटी में भी मैं इस आवश्यक जागरूकता को लाने का प्रयास करना शुरू किया है पर फिर वही बात... अच्छी आदतें न शुरू कर पाने के सौ बहाने। पर लोगों को ये समझना होगा कि इस विषय पर भाषणबाजी, लेखनबाजी करने का हक़ अब उसी का हो जिसकी दिनचर्या का हिस्सा धरती माँ के खस्ता स्वास्थ्य की तीमारदारी करना हो।

   इस लेख में स्व का उदाहरण सिर्फ इसलिए लिखा क्योंकि  मेरे लिए अब ये दिन के तमाम कामों की तरह एक जरूरी काम है। ये विषय अब फ़ैशन या दिखावा नहीं, मेरी आपकी और हर एक इंसान की जिम्मेदारी नहीं धर्म है। इसे पूजा - पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पालन किया जाना अनिवार्य है।


लिली मित्रा


शनिवार, 1 अगस्त 2026

नज़्म


 

फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है

जहद- ए -मुसलसल के बाद

लम्हा - लम्हा तितलियों की कहानी है

दरख्तों की ज़ुबानी है


ख़ुश्क हसरतों पे

बादलों की मेहरबानी है

रेज़ा रेज़ा ये बारिश

सेहरा पे बागवानी है...

गुज़रती मसर्रत से ज़िंदगानी है


फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है।

शनिवार, 4 जुलाई 2026

आलू








 अपनी प्यारी आलू जी

कितनी सुन्दर प्यारू जी


मटक मटक कर चलती हो

कजरारी आंखें मलती हो


इनको कोई काम न धाम

दिन भर सोए करे आराम


नाममात्र की करती सैर

पसार के बैठे अपने पैर


पसंद कलेजी और मटन

चाट के मूंछें हो जाती टन्न


बना के भोला अपना मुँह

हिला पूँछ करती कूं - कूं


पैर उठाकर देती है पॉ

हैलो करने का ये इनका लॉ


प्यार सभी का चाहिए खूब

जितना भी दो नहीं है ऊब


वैसे दिखती सीधी है

लेकिन गैंग की दीदी है


दौड़ लगाए झटर पटर

होता जब कोई भी मैटर


फिर पड़े लद्द से आलू जी

मोटू मोटू भालू जी


प्यारी प्यारी आलू जी

अपनी सुंदर आलू जी

मंगलवार, 16 जून 2026

बादल


चित्र : साभार गूगल

मैंने पकड़ा नहीं है

बादलों को

अपनी मुट्ठियों में कभी

मैं बस देखती हूँ आस भरी

 निगाहों से

नीले आकाश पर तैरते हुए

या,पहाड़ों की चोटियों से

लिपटकर गुज़रते हुए,

सुना है वे छूकर गुज़रते हैं

तो भीगा जाते हैं

अपनी आर्द्रता से

मैंने कभी तुमको भी नहीं

पकड़ा अपनी हथेलियों से,

बस देखती रहती हूँ

तैरते हुए बादलों की तरह

अपने प्रेमाकाश पर

चाहती हूँ बन जाना किसी

 पर्वत का शिखर

चाहती हूँ तुम लिपट कर

 भिगा दो मुझे भी।

अदृश्य तुम






 कविता से जब 'तुम' हो जाता है अदृश्य

तो बचती हैं-

खुली हुई खिड़कियाँ...

खुले हुए दरवाज़े...

भरे हुए बादल सा भरा हुआ मन...

कल्पनाओं का कोरा संसार..

खुली डायरी के फड़फड़ाते पन्ने...

विचारों की निरर्थकता...

उदासीनता का महत्व...

ठहराव का सत्य...

जीवन का बहाव...

अस्तित्व का एकांत बन जाता है

एक शुरुवात का मार्मिक अंत।

तब लिखी नहीं जाती

कविताएँ ...

आ जाता है उन्हें जीना

सही मायने में..

सोमवार, 13 अप्रैल 2026

मुक्तियां


 


एक बात कहूँ-
मैं आजकल सब भूल जाती हूँ
दिन भूल जाती हूँ
तारीखें भूल जाती हूँ
घटनाएँ भूल जाती हूँ
यहाँ तक कि-
कुछ सोचते हुए अपने ही विचारों
के क्रम भूल जाती हूँ,

कहते-कहते किसी बात को,
उसके कहने का प्रयोजन भी
भूल जाती हूँ
और सच कहूँ तो-
मैं बहुत संतुष्ट हूँ अपनी इन 'मुक्तियों' से

उन्मुक्ति की ओर बढ़ते
मेरे कदम
मानों 'परों' में तब्दील
होते महसूस हो रहे
मेरा आकाश तैयार हो रहा है शायद

शनिवार, 28 फ़रवरी 2026

हे बसंत !


 


हे बसंत!

तुम पलाश की आग में 

सुलगते हुए

पक्षियों के कलरव से

भरे हुए

नीले आकाश की स्पष्टता 

से परिष्कृत 

पुष्प सौरभ से सुरभित

हवा से आंदोलित 

कैसे झर जाते हो 

गोरी के फैले आंचल में!

कैसे ठहर जाते हो 

मन के चंचल आंगन में!

कैसे छनक जाते हो 

स्मृति की टूटी पायल में!

हे बसंत! 

तुम आते हो उल्लास का उजास

रंग ,सुगंध का आभास लिए

चले जाते हो शुष्क  पतझड़

का विरही आलाप दे कर

तुम्हारी प्रतीक्षा में पाषाण हुआ 

मेरे मन का एक कोना

बन चुका है तुम्हारी 

मधुर स्मृतियों का भग्नावशेष

लिली ,🌺