मंगलवार, 16 जून 2026

अदृश्य तुम






 कविता से जब 'तुम' हो जाता है अदृश्य

तो बचती हैं-

खुली हुई खिड़कियाँ...

खुले हुए दरवाज़े...

भरे हुए बादल सा भरा हुआ मन...

कल्पनाओं का कोरा संसार..

खुली डायरी के फड़फड़ाते पन्ने...

विचारों की निरर्थकता...

उदासीनता का महत्व...

ठहराव का सत्य...

जीवन का बहाव...

अस्तित्व का एकांत बन जाता है

एक शुरुवात का मार्मिक अंत।

तब लिखी नहीं जाती

कविताएँ ...

आ जाता है उन्हें जीना

सही मायने में..

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