शनिवार, 1 अगस्त 2026

नज़्म


 

फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है

जहद- ए -मुसलसल के बाद

लम्हा - लम्हा तितलियों की कहानी है

दरख्तों की ज़ुबानी है


ख़ुश्क हसरतों पे

बादलों की मेहरबानी है

रेज़ा रेज़ा ये बारिश

सेहरा पे बागवानी है...

गुज़रती मसर्रत से ज़िंदगानी है


फिर शाख पे रौनक है

फिर गुलों पे जवानी है।

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