एक अच्छी आदत शुरू न कर पाने के कितने बहाने हम दे पाते हैं, हैरत होती है ! जितने बहाने हम सोचते हैं उतनी देर में शायद वो अच्छी आदत शुरू की जा सकती है... नहीं? मैने ये विचार कई बार किया है। फिर वो चाहे अपने स्वास्थ्य के प्रति अपना कर्तव्य हो या धरती माँ के बिगड़ते स्वास्थ्य के प्रति जागरूक होने का धर्म हो। और आप यदि बारीकी से सोचें तो पाएंगे कि - अधिकांश लोग इन दोनों ही मामलों में बहुत ढिलाई बरतते हैं।
ऐसा ही एक विषय है जो पृथ्वी की पारिस्थितिकी को बहुत तेजी से विषाक्त बना रहा है - प्लास्टिक कचरा।
मुझमे ये जागरूकता आई तो चार - पाँच साल पहले पर इसे कार्यरूप में परिणीति मैं इस वर्ष दे पाई। वही बात कि - अच्छी आदतें शुरू न करने के सौ बहाने होते हैं हमारे पास। खैर मेरे इस संकल्प की परिणिति थोड़ी परिश्रमजन्य रही परन्तु परिणाम आत्मिक संतोष से परिपूर्ण है।
करीब दो साल से मैने रसोई के गीले कचरे जैसे सब्ज़ी के छिलकों, चाय-कॉफी, अंडे के छिलकों आदि से जैविक खाद बनाना शुरू किया अब मुझे अपनी छोटी सी ही सही पर हरी -भरी बगिया के लिये खाद मिल जाती है।
इसी तरह अब प्लास्टिक की पन्नियों, दूध - दही, तेल की थैलियों, दंत -मंजन , कॉस्मेटिक वाले प्लास्टिक से बने हर तरह के कचरे को धोकर सहेज कर रखने की आदत हो गई है। फिर मैने सोशल मीडिया पर इनके उचित निस्तारण के लिए कार्य करने वाली संस्थाओं का पता लगाया, और अब... मुझे बहुत अच्छा अनुभव हो रहा है...ये सोचकर कि मैं पृथ्वी की पारिस्थितिकी को और बुरी हालत में न जाने देने के लिए अपना अंशदान करने लगी हूँ, देर से ही सही ।
अपनी सोसाइटी में भी मैं इस आवश्यक जागरूकता को लाने का प्रयास करना शुरू किया है पर फिर वही बात... अच्छी आदतें न शुरू कर पाने के सौ बहाने। पर लोगों को ये समझना होगा कि इस विषय पर भाषणबाजी, लेखनबाजी करने का हक़ अब उसी का हो जिसकी दिनचर्या का हिस्सा धरती माँ के खस्ता स्वास्थ्य की तीमारदारी करना हो।
इस लेख में स्व का उदाहरण सिर्फ इसलिए लिखा क्योंकि मेरे लिए अब ये दिन के तमाम कामों की तरह एक जरूरी काम है। ये विषय अब फ़ैशन या दिखावा नहीं, मेरी आपकी और हर एक इंसान की जिम्मेदारी नहीं धर्म है। इसे पूजा - पाठ और अन्य धार्मिक अनुष्ठानों की तरह पालन किया जाना अनिवार्य है।
लिली मित्रा

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