मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026

विपश्यना

 





देखो !

क्योंकि देखना दिखाता है -

घटित , घटना और घटक।

बनाने,संवारने, सहेजने के

इस उपक्रम में बदल जाता है

दृष्टा का गंतव्य और मंतव्य

प्राप्ति और हानि के बदल जाते हैं आशय

जो हाथ से छूट गया वो बना ही नहीं आपके लिए

और जो प्राप्त हुआ वो आपका था ही नहीं कभी...

कर्तव्य के इस सतत् क्रम में  बनता जाता है

शून्य का एक विशाल वृत्त

जिसकी परिधि से टकराते हुए

बन जाते हो आप बस एक निमित्त मात्र

बनाया हुआ, संवारा हुआ बह जाता है

अपनी राह

और आप शून्य के वृत्त पर

कुरेदते रहते हो धूमिल पड़ चुके अतीत के चित्र

विपश्यना का यह अभ्यास लाभ, यश,अधिकार, पुरस्कार, हार - हताशा, क्षोभ - लोभ, उत्कंठा- व्यग्रता जैसे मनोभावों

की बदल देता है परिभाषा

एक आवश्यक पर्यावरण के पारिवेशिक घटक से

दिखते हैं सब

देखो !

क्योंकि देखना दृष्टा को बनाता है

निर्मोही सृष्टा

समझाता है-

एक निर्धारित सीमा के बाद 


ईश्वर की असमर्थता

लिली