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रविवार, 2 अप्रैल 2017

'भाषा' अभिव्यक्ति का माध्यम,,स्वार्थपूर्ति का साधन नही

(चित्र इन्टरनेट से)

'भाषा',,, एक माध्यम जिससे हम अपने भावों और विचारों को बोलकर,लिखकर या सुनकर अपनी बात किसी को समझा या बता सकते हैं। यह 'भाषा' की सबसे सरलतम् परिभाषा ,,जिसे किसी भी भाषा विशेष के 'व्याकरण' के प्रथम अध्याय मे व्याख्यापित किया जाता है। 'भाषा' शब्द का अंकुर जब पुस्तकीय गर्भ से बाहर निकल मानवीय पर्यावरण मे अपनी सरलतम् परिभाषा के साथ पल्लवित होता है, तब वह कई शाखाओं-प्रशाखाओं मे बंट एक पौध से वृक्ष का रूप धारण करता चलता है।
  पुस्तक मे भाषा की परिभाषा को व्याख्यापित करने से बहुत पहले भी भाषा का एक बहुत मृदुल और वात्सल्यमयी अस्तित्व होता है। नवजात शिशु की भी एक भाषा होती है,,, जिसकी परिभाषा को किसी शब्द-समूह मे नही बांधा जा सकता। उसका क्रन्दन,,मातृ-स्पर्श,नाना प्रकार की ध्वनियां, हाथ-पांव को झटकना एक नवजात शिशु की भाषा होती है। तो यहाँ भी हम भाषा का अस्तित्व एक बहुत कोमल और वात्सल्य रूप मे पाते हैं। भले ही अर्थपूर्ण शब्दों के वाक्य समूह यहाँ नही देखने को मिलता,,, परन्तु फिर भी एक नवजात शिशु भी अपनी बात,अपने भाव अपनी माता तक पहुँचा देता है ।
   शनैः शनैः इन्द्रियों के विकास के साथ-साथ शिशु की भाषा भी विकसित होती जाती है। माँ द्वारा सिखाया गया प्रथम अर्थपूर्ण शब्द 'माँ' बालक उच्चारण करना सिखता है, और फिर तो आस-पास के पर्यावरण को देख,,अपने परिवारजनों के द्वारा बोले जाने वाले आपसी संवादों को सुन,,,एक बालक का धीरे धीरे भाषा ज्ञान विस्तार पाता जाता है। यह भाषा का 'व्यक्तिगत स्तर' है।
  पारिवारिक परिवेश से बाहर निकल जब बालक विद्यालय मे प्रवेश करता है तब शुरूवात होती है भाषा के 'सामाजिक स्तर' की। यहाँ से भाषा के कई रूप,कई प्रकार बालक के सामने प्रकट होते हैं। उसे लगता है जो भाषा वो अपने पारिवारिक परिवेष मे व्यवहार करता है उससे अलग भी कई और माध्यम हैं जिनसे व्यक्ति अपने भावों अथवा विचारों को बोलकर,लिखकर,सुनकर समझा सकता है।
   पुस्तकीय ज्ञान से वह 'भाषा के सामाजिक स्तर' को व्याकरण एंव लिपि के नियमबद्ध अध्ययन द्वारा आत्मसात करता है।यह अति महत्वपूर्ण चरण है,,क्योकि व्यक्ति को अपना जीवन चलाने हेतु जीविकोपार्जन की आवश्यकता होती है।  और बालक के जीवन का यह अध्ययनकाल उसके जीविकोपार्जन का आधार निर्धारण करता है।
    यदि भारत जैसे बहुभाषीय देश का नागरिक हो तो भाषा के कई प्रकार देखने को मिलते हैं। साथ ही साथ 'भाषावाद' नामक एक नया 'कारक' उभरता है। प्रान्तीय,क्षेत्रीय स्तरों पर भाषा मे वैभिन्नय देखने को मिलता है,,,, और भाषा का 'राजनैतिक स्तर' अपना परिचय कराता पंक्तिबद्ध दिखाई देता है।
   भाषा के इस राजनैतिक स्तर' मे एक व्यक्ति विशेष को अपने विचार और भाव बोलकर,लिखकर या सुनकर समझाने के लिए उस राज्य या क्षेत्र विशेष मे बोली जाने वाली भाषा का ज्ञान होना आवश्यक हो जाता है। और 'मातृभाषा' का अस्तित्व प्रकाश मे आता है। अर्थात भारत जैसे बहुभाषीय देश के जिस प्रांत के आप मूल निवासी हैं ,,वहाँ बोली जाने वाली भाषा आपकी 'मातृभाषा' बन जाती है। तो इस प्रकार मात्र 'स्पर्श' और'क्रन्दन' 'से शुरू होने वाली भाषा का विकास कितना वृहद् रूप धारण करता जाता है।
   विकास के इस क्रम मे वृहदत्तम् रूप धारण करने वाली भाषा मे कुछ जटिलताएं आना अतिस्वाभाविक है। विभिन्नताओं को देखते हुए पूरे देश को एक सूत्र मे बांधे रखना प्राथमिकता बन जाती है,,,,और यहाँ भाषा का 'राष्ट्रीय स्तर' आकार लेता दिखता है। अनगिनत 'भाषायी माध्यम' के होते हुए यह एक राष्ट्र विशेष के लिए परमावश्यक हो जाता है कि वह एक ऐसे 'भाषायी माध्यम' का चुनाव करे जिसका प्रयोग कर उस देश का नागरिक अपने भाव या विचार लिखकर,बोलकर या सुनकर समझा सके।
  'वसुधैव कुटुम्बकम्' की भावना को अपना मूलमंत्र मान सम्पूर्ण विश्व के देश अपने विकास और मानव कल्याण हेतु एक मंच आयोजन करते हैं। जहाँ विश्व के सभी छोटे बड़े देश मिल बैठकर आपसी सहयोग एंव सहभागिता के साथ अन्तर्राष्ट्रीय स्तर पर शान्ति एंव सुव्यवस्था स्थापित करने को सतत् प्रयासरत हैं,,। यहाँ भाषा का 'अन्तर्राष्ट्रीय स्तर'  प्रकाशमान होता है,,,ऐसे मे  विश्व मंच को एक ऐसे 'भाषायी माध्यम' का चयन करना होता है जिसका प्रयोग कर  वहाँ एकत्रित सभी देश अपने भाव और विचार लिखकर,बोलकर,या सुनकर समझा सकें।
   इसप्रकार अपने मृदुल वात्सल्यमयी शैशव काल से भाषा मानवीय पर्यावरण के व्यक्तिगत,सामाजिक,राजनीतिक,राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तर तक विकसित एंव पल्लवित होती हुई  पहुँचती है। स्तरों मे विकास होना सतत् चलायमान होता है,, परन्तु भाषा की परिभाषा वही रहती है,,, 'एक ऐसा माध्यम जिसके द्वारा अपने विचारों को लिखकर,बोलकर या सुनकर समझाया जा सके।" परन्तु इस सरलतम् रूप से परिभाषित भाषा व्यक्तिगत,सामाजिक,राजनीतिक,राष्ट्रीय और अन्तर्राष्ट्रीय स्तरों पर अपने इन सभी स्तरीय स्वार्थों की पूर्ति का साधन मात्र बन कर रह गई है,,,जोकि दुर्भाग्यपूर्ण हैं।
   भाषा का हित अभिव्यक्ति का माध्यम बनने मे है,,इसे स्वार्थपूर्ति का साधन ना बनने दें। इसकी सरलतम् परिभाषा को विभिन्न स्तरों पर मनोभावों की अभिव्यक्ति से मृदुल और वात्सल्यमयी रहने दिया जाए,तभी भाषा का अस्तित्व पूर्णता प्राप्त कर सकता है।

शनिवार, 30 जुलाई 2016

शब्दों की महिमा

                                         (चित्र इन्टरनेट की सौजन्य से)

   'शब्द ब्रह्म है', 'शब्दों का चातुर्य','शब्दों का भ्रमजाल','शब्दों का पहाड़',,,,,ढाई अक्षर का यह 'शब्द'  कितना प्रतिभाशाली,,,कितना प्रभुत्वशाली !!!!!!इसकी महिमा अबरम्पार है,कभी सोचती हूँ तो अस्मंजस्य के विशाल सागर में डूबती जाती हूँ।
    इनका प्रभुत्व और प्रभाव कल्पना से परे है,'शब्दों के तीर ह्दय को चीर भी जाते हैं, तो घावों पर मलहम भी लगाते हैं। हतोत्साहित चित्त को उत्साह से लबालब कर सकते हैं तो थोडे से प्रयास मात्र से जोश से भरा मटका चकनाचूर भी कर सकते हैं।एक युद्धनायक  के मुख से निकलने वाले वीरता, त्याग,बलिदान की भावना से भरे 'शब्द रूपी अग्निबाण' सेना पर जोश और उत्साह की अग्निवर्षा कर देते हैं जो कि कभी कभी साधन व संख्या के अभाव मे भी सेना के मनोबल को नही टूटने देते।
     एक उदास और एकाकी मन को यदि 'प्रसन्नचित एंव चुलबुले शब्दों' का सानिध्य मिल जाए,,,तो कब उदासीनता और एकाकीपन रफूचक्कर हो जाता है,पता ही नही चलता।
ह्दय मे प्रेम पुष्प खिला सकते हैं तो उतनी ही सक्रियता से मन को हताहत भी कर सकते हैं। द्वेष,घृणा,भय आदि सभी मनोभावों को बखूबी अपने मे आत्मसात कर ये 'शब्द 'परिस्थितियों को अपने अनुकूल ढालने का दमखम रखते हैं।
         यह सब शाब्दिक चमत्कार तभी सम्भव है जब आप 'शब्दों के धनी' हैं और उनका समयानुसार उचित प्रयोग करने मे सक्षम हैं,,,,,,,,मात्र भावनाओ का उफान 'शब्दों' के अभाव मे शून्य है। एक कवि, या लेखक जब सुन्दर और उपयुक्त शब्दों के साथ मनोभावों को अभिव्यक्ति देता है,,,,विषय का सौन्दर्य मन्त्रमुग्ध कर देता है।
       जहाँ लेखक,वक्ता यदि 'शब्दों के भ्रमजाल' से भ्रमित कर सकता है तो, मात्र अपने 'शब्द-कौशल' को दर्शाने हेतु भाव रहित, रस विहीन 'शब्दों का पहाड़' भी बना सकता है। विषय मे रूचि भी उत्पन्न कर सकता है या नीरस भी बना सकता है।
       कुशल वक्ता अपने 'शब्द चातुर्य' से जनसमुदाय के समक्ष कुशलता से अपनी बात रख ,अपने वांछित उद्देश्यों की पूर्ति हेतु जनमत का रूख अपनी तरफ मोड़ सकता है।
       सम्पूर्ण समर्पण और प्रेमभाव से प्रस्तुत किए गयें शब्द दूर से ही जन्म-जन्मान्तर के बन्धनों मे बांध देते हैं,,, तो कुंठा और क्रोध भाव से भरे शब्द एक ही झटके मे सभी बन्धनों को तोड़ देते हैं।
     शब्द 'कटार' है,, शब्द 'ढाल' है,,,शब्दों से ही भावों की अभिव्यक्ति है,,,शब्द 'तृष्णा है,,,शब्द ही तृप्ति है। भावनाओं सम्वेदनाओं का मानव जीवन मे तब तक कोई अस्तित्व नही है,जब तक उन्हे उचित,उपयुक्त शब्दों मे ढालकर अभिव्यक्त ना किया गया हो।
       यह लेख शब्दों के महिमा जाल में फंसे मेरे हतप्रभ मन की एक शब्दमयी अभिव्यक्ति है,,,मेरी आत्मानुभूति है,,,,
जो कि बस शब्द रूपी ब्रह्म का एक सूक्ष्म अंश मात्र है।
और भी बहुत कुछ है मेरे चिन्तन से परे। 'शब्द ब्रह्म' है इसी निष्कर्ष के साथ मै फिर से इस महिमामय अस्मंजस्य के दिव्य सागर मे डूब जाना चाहती हूँ।