शुक्रवार, 23 अगस्त 2019

अतृप्ता पर, ताराचन्द शर्मा जी की अनूठी समीक्षा..


कुछ अलग हटके।
आज एक खत कविताओं के नाम
आज कविताओं की एक कविता

लाजवाब कवयित्री लिली मित्रा के कविता संग्रह "अतृप्ता" की सशक्त कविताओं की एक कविता।
यह संग्रह 51 बेशकीमती मोतियों की एक ऐसी माला है जिसका प्रत्येक मोती अपनी एक अलग ही आब लिए हुए है। उन 51 कविताओं के शीर्षकों को क्रमशः गूँथ कर मैंने भी एक माला बनाने की कोशिश की है। पर इनका असली आनन्द तो आपको "अतृप्ता" पढ़कर ही प्राप्त होगा।
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ऐे मेरे देव!
#मेरी_कविताओं_के_कवित्व
नमन तुम्हें।

#हे_साहित्य_मैं_तुम्हें_आत्मसात_करती_हूँ"
सत्य की तरह।
क्योकि ये
#शिव_सम_साहित्य_मेरा
जो सर्वाधिक सुन्दर है।

मैं अपने भीतर भी
अपनी कविताओं की तरह
#बंधन_मुक्त_कविता" हूँ।
नही चाहती मैं किसी भी तरह की
#सीमाओं_का_बंधन"
न कविता में, न खुद में।

जानती हूँ
#कुछ_यूँ_था_अपना_अफ़साना"
कि
#मैं_गीत_हूँ_उसके_लिए"
उसके प्यार में
#कुछ_शब्द_यूँ_ही_गिर_जाते_हैं
मेरे प्रिय
#तुम्हारी_यादों_की_रजनीगंधा
से महका ये मेरा
#मन_गिलहरी" सा हो गया है।
तुम्हे
याद होगी
#वो_दिसम्बर_की_भोर
जब,
चंद पलों के बिछोह से भी
अनायास निकला था मेरे भीतर से
#आई_मिस_यू

ओ
#मेरे_आत्मसंगी
#सुनो_मेरे_वट
मैं जब भी सोचती हूँ तुम्हे
#समुद्री_लहर_सा_पाती_हूँ
इस
#मैं_और_तुम" में
तुम ही तो हो
जो मैं हूँ।
तुम
#तुम_टेसू_के_जंगल"
मेरे लिए।
मेरा
भूगोल भी
मेरा
#भूडोल" भी।

सुनो देव!
इस
#अपराजिता_की_अभिलाषा" है
जान सकूँ कि
#खुशबू_क्यों_अदृष्यमान?"

#सुनो_सजना
तुम
#यूँ_सताया_न_करो"
तुम
जब भी चाहोगे
जहाँ भी चाहोगे
#मुझे_पाओगे

कहते है
#प्यार_को_पूर्णता_कहाँ?
सच ही कहते है।
ये तो अनन्त है, अपार है।

और
एक सवाल
तुझसे भी
#ऐ_ज़िन्दगी!
तूने ये
#मेरे_हाथों_की_लकीरें"
किस तरह से लिखी हैं?
मुट्ठी में बंद ही नही होती।

तूने तो
मेरा
#मन_गौरैया_बना_डाला
जो
आ जाती है चहकती हुई
शयनकक्ष में
और बैठ जाती है
सिरहाने
#तकिये" पर।
और तकिया
मुझे कहता है
#हौले_से_सरक_जा"

ये
मेरा ममत्व,
#मेरे_मन_का_मधुमासी_कोना"
फिर चल दिया
एक अजाने
"सफ़र" पर।
एक बार
फिर लगा
"न जाने कैसा हो मेरा अवसान"
फिर बन गया
मेरा
"दिल एक अंतहीन मैदान"
जिसमें कोई
"ठहराव" ही नहीं है।
इसलिए
अब
"मुझे विषय मत बनाइए"
मैंने
"निज जीवन तुम पे वारा है..."
तुम्हारे संग
बस ये
"एक ख़्वाहिश" रही है मीत
कि ये
"नदी रूख़ मोड़ लें"
ये
"फुसफुसाती ख़ामोशियाँ"
दोनों मिलकर सुनें।
इसलिए
मेरे देव
"लो फिर हाज़िर हूँ" मैं।
"मेरी निराशाओं के अंधकार"
रौशनी चाहते हैं तुमसे।
मेरे
"दास्तानी परिंदे"
परवाज़ करना चाहते हैं
तुम्हारे खुले आकाश में।
हाँ प्रिय हाँ
"हाँ यह मेरा ही जलाया अग्निकुंड" है
जिस में तप कर
कुंदन होना चाहती हूँ मैं।
तुम्हारी
"वो झूमती, किसी गाछ-सी" लड़की
शिला होना चाहती है
जिसपर तुम जीवन-तप कर सको।
मेरे साथी
ये
"मेरे रोज़नामचे"
कड़ियाँ हैं
तुम्हारे और मेरे बीच की।
सत्य की।
बीच में कोई और
"मुखौटा" नहीं है।
ना ही इनमें कोई
"निष्कर्षविहीन आत्म-मंथन" है।
सब
मेरे "मन की मथनी" का मथा हुआ
नवनीत है।

ये
जो
"एलीफेंटा के भित्तिचित्र"
मेरे वजूद में उभर आए है
मुझे समझने के लिए
"काफी हैं" तुम्हारे लिए।

समझो
तो तुम्हारी
"अतृप्ता"

~~ताराचन्द 'नादान'

सोमवार, 19 अगस्त 2019

परित्यक्ता,,,



 हे पुरूष सुनो!
तुम प्रेम करना,,
फिर,
राम बन जाना,,
कृष्ण बन जाना
बुद्ध बन जाना
कालिदास बन जाना
मै तुम्हारे हर अवतार की
सहचरी बन
तुम्हारे पौरूष को
अपने सुकोमल प्रेमिल
स्पर्श से,,वज्र सा पुरूषत्व
गढती रहूगीं,,,
फिर,
तुम बेहिचक चले जाना
अपने कर्तव्यपथ पर,,,
मै बस चुप रहूँगीं,,
तुम्हारे संग बिताए
अह्लादित प्रेम सरोवर
को हृदय में दबोचकर
सीता सी सुमरी जाऊगीं
राधा सी पूजी जाऊगीं
यशोधरा सी घुटती जाऊगीं
मल्लिका सी बिसरा दी जाऊगीं

रविवार, 18 अगस्त 2019

एक टुकड़ा ज़िन्दगी,,,

                    (चित्राभार इन्टरनेट)

मुझे बारिश से तर सड़कों पर
आस-पास की सब्ज़ महकती हरियाली
के बीच
तुम्हारे संग चुपचाप चलना है
किसी फूँस की बनी  चाय की टपरी
पर रूक कर,,
चाय पीनी है,,,
जो
अचानक धमक पड़ी बारिश
में मिली पनाह हो,,,,,
आस पास कुछ और ना हो
कुल्हड़ की चाय से उठता
धुँआ और तुम्हारे मेरे साथ
की गरमाहट,,,
बस यही दो गर्माहट का
जरिया हो,,
बाकी सब बारिश में भींग
कर कपकपाता ,,ठिठुरता दिखे,,
मुझे चुप ही रहने का मन है
बोलना बस तुम,,,
तुम्हारी कहन के सुर संग
मैं बारिश के साज़ों
की संगत बिठाती
बस शरमाऊगीं,,
मुस्कुराऊँगी,,या फिर
अपने भीतर उठ रहे एहसासों
के बवंडर को छुपाने के खातिर
ज़ोर का ठहाका लगाऊगीं,,,
पूरा ना सही
एक टुकड़ा ज़िन्दगी
मिल जाती
किसी मोड़ पर ऐसी भी ,,,
बरसात बन के
चाय की टपरी बन के,,
एहसासों का बवंडर बन के
लिली❤

मंगलवार, 6 अगस्त 2019

वो तेरा मुझको ,,याद आना,,,


वो तेरा,,,,मुझको याद आना
जैसे बारिश की बूँदों का
बिजली के तारों पर ,,,,,ठहर जाना,,,
जाना सुनो!
शीशे से चमकते मेरे
एहसासों पर
ज़रा हौले से
हवा बन के गुज़र जाना,,

वो तेरा,,,, मुझको याद आना
जैसे, भारी बारिश के बाद
पीले कनेर की डालियों,,का झुक जाना,,
जाना सुनो!!
दो पल मेरी छांव तले
झरती प्रीत
में नरम दूब सा
तुम भी भींग जाना,,,

वो तेरा,,,मुझको याद आना,,
जैसे तार पे बैठे गीले पंक्षी का
पर फुला कर गदरा जाना,,
जाना सुनो!
निगाहों को तौलिया बना
हौले हौले
बड़े प्यार से सहलाकर
दुलरा जाना

वो तेरा,,मुझको याद आना❤

लिली😊

मंगलवार, 30 जुलाई 2019

जागती आँखों का ख्वाब



आसमान से गिरा
और ज़मीन से टकरा कर
चकना चूर हो गया,,,
इतने बारीक हुए टुकड़े
के फिर जुड़ना
नामुम्किन सा हो गया,,
वो कोई तारा नही था,,
वो तो 'एक ख्वाब' था
जागती आँखों का,,
और ये सब मेरी आँखों के
सामने हुआ,,
मैने उसे बादलों की
आगोश में पनपते देखा था,,
उगते सूरज की अलसाई
नरम धूप में उगते देखा था,,
चाँद की हथेली पर
अपने नूरानी चेहरे
को थमा
चाँदनी सा बिखरते देखा था,,
नदी की लहरों पर
बरसते सावन सा
झूलते देखा था,,
जागती आँखों
का वही ख्वाब,
जिसके हर किरचें
में एक सख़्त सा दर्द है
जो  हर नर्म एहसास
से डरता है,,
वो 'प्रेम का जला है
नेह भी फूँक-फूँक
के पीता है' ,,,,
कंकरीट ही बिछाता है
पत्थर ही चबाता है
वह प्रेम का जला है,
नेह भी फूँक फूँक के पीता है
फूँक-फूँक के पीता है
वो जागती आँखों
ख्वाब,,,,

लिली😊

रविवार, 28 जुलाई 2019

बच्चों के लिए देशगीत

                    (चित्राभार इंटरनेट)

आन तिरंगा है
शान तिरंगा है
हर भारतवासी का अभिमान तिरंगा है

आज़ाद चमन के हम
फूल निराले हैं
हीमा सी मृग के हम
स्वर्ण शिवाले हैं
दृढ़ निश्चय की मन में बहती गंगा है

शान तिरंगा है
आन तिरंगा है
हर भारतवासी का अभिमान तिरंगा है

प्रगति करें अविरल
नही रुकने वाले हैं
ले चंद्रयान के पंख
बस उड़ने वाले हैं
उन्नत भारत का आगाज़ मृदंगा है

शान तिरंगा है
आन तिरंगा है
हर भारतवासी का अभिमान तिरंगा है।

रविवार, 21 जुलाई 2019

हाँ,,मै ही ज़िन्दा हूँ


#हाँ_मै_ही_ज़िन्दा_हूँ

चिथड़ों मे लिपटा
सरदी,गरमी,बरसात
हर मौसम में
सड़क के किनारे
फुटपाथ पर
दुकानों के शेड तले
और आजकल
बरगद के पेड़ के नीचे
अपना डेरा जमाए है
खुद में बड़बड़ाता
खोखली निगाहों में
ना जाने क्या कुछ भरता
जी रहा है,, या मुर्दा है?
नही पता !
खुड़दड़ी सड़क पर
अपनी पीठ को
घस घसकर खुजलाता
मंदिर के पास लगे
नलके के नीचे
जब तब खुद को भीगाकर
गरमी को दुलारता
वो जी रहा है,,या मुर्दा है?
नही पता!
एक कम्बल और
गुदड़ी की पोटली
सी सम्पत्ति
को खुद से चिपकाए
वो खुद गठरी बना
निश्चिंत सोता मिलता है
अक्सर मुझे
और मैं,,,,,
डबल बेड के आरामदायक
फैलाव में फैलकर भी
ठंडे एसी के सुकून
भरे माहौल में भी
बेचैन,,थकी,,और उलझी हुई!!!
शायद जीवन तो मै ही जी रही
वो तो मुर्दा है,,!
अपने होने का कारण
खोजती
लक्ष्यों की लिस्ट बनाती
उन तक पहुँचने
के पथ खोजती
हाँ,,,, मै ही ज़िन्दा हूँ,,
लिली😊