(चित्रा मेरे द्वारा☺)
सुर्ख रंग तेरा और गहराया,
तेरे सुरूर में जब मेरे इश्क़ का ग़ुरूर ठहराया।
आंखों की मस्तियाँ, ना कर सकीं पर्दादारी,
बहके अल्फ़ाज़ों ने कई बार तेरा नाम दोहराया।
हर घूँट में तुझे घोल कर पीते गए,
फिर यूँ हुआ के, हर चेहरे में बस तू नज़र आया।
छलकते जाम को बड़ी हिफ़ाज़त से थामा हमने,
क्यूँ लगा के वो गुज़रा,और मेरा आंचल लहराया।
लटपटाए होंठो पर,तब्बसुम सी बिखरी,
प्याले को छुआ हमने,या कोई साग़र
टकराया।
सुर्ख रंग तेरा और गहराया,
तेरे सुरूर में जब मेरे इश्क़ का ग़ुरूर ठहराया।
आंखों की मस्तियाँ, ना कर सकीं पर्दादारी,
बहके अल्फ़ाज़ों ने कई बार तेरा नाम दोहराया।
हर घूँट में तुझे घोल कर पीते गए,
फिर यूँ हुआ के, हर चेहरे में बस तू नज़र आया।
छलकते जाम को बड़ी हिफ़ाज़त से थामा हमने,
क्यूँ लगा के वो गुज़रा,और मेरा आंचल लहराया।
लटपटाए होंठो पर,तब्बसुम सी बिखरी,
प्याले को छुआ हमने,या कोई साग़र
टकराया।
अनुभूतियां जब सावन के बादलों की तरह सघन और गहन हो जाती हैं तो बरसने लगती हैं। अनुभूतियों की बारिश प्रायः रिमझिम होती है जो उल्लासित करती हैं उत्साहित करती हैं। इस रचना में भी लिली जी ने गहन और सघन भावों को कभी आँचल कभी सागर, सुरूर, गुरुर, तबस्सुम आदि में विभाजित कर रिमझिमी फुहार निर्मित की हैं। रचना को पढ़ते समय शब्द की बूंदें एक हल्की सिहरन निर्मित करती हैं और इस आधार पर बेहिचक कहा जा सकता है कि अभिव्यक्ति अति उत्तम है।
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