सोमवार, 25 जून 2018

मौसम बदल जाय

उमस,बारिश,
चिलचिलाती धूप,

दुर्गंध,मन,उचाट,
गहरी सांस,सूनापन,

उदास गज़ल,तल्खी,थकान,,,
ये भावों की बेमेल भीड़,

सार्थक वाक्य बनते नही
कागज़ उड़े,कलम चलती नही

फिर भी मै लिखने पर अमादा
ज़िद है एक,,शायद उतारने से
भाव कागज़ पर मौसम बदल जाए,,,,,,,,,,
~लिली😊

इन्द्रधनुष

सब रंग खोए मुझमें थे
मैं खोज रही थी
इन्द्रधनुष,,,
जाने मन के,किस कोने
में था एक सघन हरा-भरा
झुरमुट,,,,
तुम छुपे वहीं बैठे थे,मुझमें
मै इत-उत ढूँढू स्वप्न
पुरूष,,,,
कहो छुपे तुम क्या करते थे
क्या सुख पाते,मुझे देख
कलुष,,,
अब पाकर तुमको,जगमग
अंतस,मन कानन के तुम
आरूष,,,

लिली ☺

(कलुष शब्द से यहाँ आशय=दुखी/क्षुब्ध होने से है)

तुम निठुर!!

छद्म भेष धर आते हो,,
हर बार मोहे छल जाते हो,,
मैं निर्मल निर्झर भाव मनी,,
तुम निठुर! हृदय दल जाते हो।

आकुल मन और बिसरा तन
तुम जीवन के अनमोलित धन
 ठग बन,सब हर ले जाते हो
तुम निठुर! हृदय दल जाते हो।

कित खोए कुछ तो बोलो अब?
सुध लोगे प्रियतम मेरी कब?
श्वासों की गति मंथर कर जाते हो
तुम निठुर! हृदय दल जाते हो,,

लिली🌿

सोमवार, 18 जून 2018

अंजाम मेरे आगे,,



                        (चित्राभार इंटरनेट)


ना जाने क्या पढ़ना चाहती हैं
 हसरतें,,
उसकी लिखी पुरानी
 बातों में,,
जबकि मैं होश में हूँ,,,,,,,,,,
और अंजाम,,
मेरे आगे।

हर शब्द पे डालती हूँ,
अर्थों के
 बहुआयाम,,
मतलब है साफ़
और बानगी,,
मेरे आगे।

फिर भी,,,,
भिड़ाती हूँ तर्कों को,, वितर्कों से,
चीरती हूँ,,दिलों पाट,,
और ,,खुलें वही
ढाक के तीन पात
मेरे आगे।

लिली🌿

रविवार, 10 जून 2018

आश़िक किनारा,,,

                    (बारिश में भींगता बम्बई का समन्दर)

आशिक किनारा
🍃🍃🍃🍃🍃🍃

बेइमान से मौसम में
बहका सा,,,,,,
समन्दर का,,,,,,
आशिक़ किनारा,,,

ऐठती लहरों में मचलती
हसरत लिए,,,,
समन्दर का,,,,,
आशिक़ किनारा,,,

कनखियों से लुक-छुप
कर देखती मेरी नज़र को,
शरारती मुस्कान लिए भांपता,,
समन्दर का,,,,
आशिक़ किनारा,,,,,

इश़्किया बारिश में
भींगती अपनी गठन,
दिखाकर लुभाता ,,,,,,
समन्दर का,,,
आश़िक किनारा,,

 हया  भरी आंखों में,,
दबे अरमानों की पलक,
 गिराकर,,,,,
 मैं बड़ी तेज़ी से
गुज़र आई,,
धड़कते दिल को अपने उभारों
से कुचल कर,,,
मैं बड़ी तेज़ी से
 गुज़र आई,,,,,
देखना चाहा दिलभर के,,
पर देख ना पाई,,,
समन्दर का ,,,,
वो आश़िक किनारा,,,

~लिली 

शुक्रवार, 8 जून 2018

इसको भी बारिश कहते हैं,,,

                       (चित्राभार इन्टरनेट)


जब तपते मन के सूखे पोर
भर जाएं पाकर प्रेमिल झकझोर
बोझिल नयनों के तकते कोर
तर जाएं आंसुओं से सूने छोर
इसको भी बारिश कहते हैं
सब बांध तोड़ झर बहते हैं!!

ओसार में गिरते बूँदों के शोर
टप टप का नर्तन होता चहूँओर
खिड़की से आती बौछारें पुरजोर
मन फिर भी प्यासा ताके तुझओर
इसको भी बारिश कहते हैं,,
जो भींग के भी प्यासे रहते हैं!!
~लिली🌿

अजि सुनते हो क्या,,,,!!!


अजि सुनते हो क्या!!!

ये पुरवा क्या कुछ कहती है,,,!
डाल पात सब बहकी है,,
बादल क्यों लेता अंगड़ाई!
क्यों ले हिचकोले तरुणाई?

अजि सुनते हो क्या,,,,,!!!

मगन गगन कुछ नटखट है
तपित धरा मन छटपट है
मुझको क्यों तुम्हरी याद आई?
क्यों बजती प्रीत की शहनाई

अजि सुनते हो क्या,,,!!

बोलो ना क्यों हो मौन धरे?
कहदो कुछ तो नहि चैन पड़े,,
मधु बैन कहो ओ हरजाई
क्यों समझों ना गोरी अकुलाई

अजि सुनते हो क्या,,,!
~लिली🌿